छत्तीसगढ़

सफलता की कहानी हिंसा के अंधेरे से सेवा और आत्मनिर्भरता की राह पर बढ़ता अबूझमाड़

सफलता की कहानी
हिंसा के अंधेरे से सेवा और आत्मनिर्भरता की राह पर बढ़ता अबूझमाड़
आत्मसमर्पित नक्सली अब समाज की मुख्यधारा से जुड़कर निभा रहे सेवा और सद्भावना की भूमिका
 सितंबर 2026 // नारायणपुर जिला लंबे समय तक नक्सलवाद की चुनौती से प्रभावित रहा है। विशेष रूप से अबूझमाड़ क्षेत्र में हिंसा, भय और नक्सली गतिविधियों का प्रभाव यहां के आम जनजीवन पर पड़ा। ऐसे चुनौतीपूर्ण वातावरण में नक्सली संगठन से बाहर निकलकर सामान्य सामाजिक जीवन में लौटना किसी व्यक्ति के लिए केवल हथियार छोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्मानजनक जीवन, परिवार के साथ पुनः जुड़ाव, सामाजिक स्वीकार्यता और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इसी सोच के अनुरूप छत्तीसगढ़ शासन द्वारा नक्सलवादी आत्मसमर्पण, पीड़ित राहत एवं पुनर्वास नीति-2025 लागू की गई है। इस नीति का उद्देश्य आत्मसमर्पित व्यक्तियों को समाज की मुख्यधारा में पुनर्स्थापित करते हुए उन्हें शिक्षा, रोजगार, स्वरोजगार, आर्थिक सहायता एवं अन्य पुनर्वास सुविधाओं से जोड़ना है। नारायणपुर जिले में पुनर्वास की यह प्रक्रिया अब आत्मनिर्भरता और सामाजिक सहभागिता के रूप में भी दिखाई देने लगी है।
अब आत्मसमर्पित नक्सली केवल आजीविका के माध्यम से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और जनसेवा से जुड़े आयोजनों में भी अपनी भागीदारी निभा रहे हैं। सेवा संकल्प अभियान के तहत आयोजित ‘आशीर्वाद का दिया’ कार्यक्रम में आत्मसमर्पित नक्सलियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर सेवा, सद्भावना और सामाजिक सहभागिता का संदेश दिया। कार्यक्रम के माध्यम से जनसेवा के प्रति आभार व्यक्त करने, समाज में आपसी विश्वास और सद्भावना को मजबूत करने तथा जनभागीदारी के माध्यम से विकसित भारत 2047 के संकल्प को आगे बढ़ाने का संदेश दिया गया।
 आत्मसमर्पित नक्सलियों की इस सहभागिता से यह संदेश भी सामने आया कि बदलाव की शुरुआत केवल नीतियों और योजनाओं से नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में आए सकारात्मक परिवर्तन और उनकी समाज के प्रति बढ़ती भागीदारी से होती है। पुनर्वास की प्रक्रिया जब आजीविका, सम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ती है, तो आत्मसमर्पण करने वाला व्यक्ति स्वयं बदलाव का सहभागी बन जाता है।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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