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एमपी के समसगढ़ की सदियों पुरानी बावड़ियां – आज भी सींच रही हैं खेतों को

भोपाल से लगभग बाईस किलोमीटर दूर, जहाँ शहर की चकाचौंध धीरे-धीरे खेतों की हरियाली में बदलने लगती है, वहां बसा है समसगढ़। समसगढ़ भोपाल जिले में का एक छोटा सा गांव है,   के पर्यटन लिस्ट में समसगढ़ का उल्लेख ऐतिहासिक स्थलों में किया गया है।

देश के अनेक हिस्से इस समय जल संकट की गंभीर चुनौती का सामना कर रहे हैं। कहीं भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, तो कहीं अनियमित वर्षा और बढ़ती गर्मी के कारण जल स्रोत सूखने लगे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में खेती के लिए पानी की उपलब्धता एक बड़ी चिंता बनती जा रही है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ता शहरीकरण और भूजल के अत्यधिक दोहन ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। ऐसे समय में पारंपरिक जल संरचनाओं और स्थानीय जल प्रबंधन प्रणालियों का महत्व एक बार फिर सामने आ रहा है।

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के समीप स्थित समसगढ़ गांव में रहने वाले अजय मालवीय के लिए पानी की कहानी कुछ अलग है। जब आसपास के कई किसान सिंचाई के लिए पानी की कमी से जूझते हैं, तब अजय अपने खेत में मौजूद एक पुरानी बावड़ी से पानी निकालकर फसलों की सिंचाई करते हैं। यह बावड़ी केवल उनके खेत की जल आवश्यकता पूरी नहीं करती, बल्कि पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों की उपयोगिता का भी जीवंत उदाहरण है।

किसान की पहल –  जब ज़रूरत ने विरासत को बचाया

समसगढ़ में एक किसान के खेत में बावड़ी अभी भी सुरक्षित है। इसके पीछे सबसे बड़ी  वजह है, उनका बावडियों के प्रति प्रेम और अपनी धरोहर को बचाने की लगन है।

अजय के अनुसार बावड़ी का सबसे बड़ा फायदा पानी के संरक्षण में मिलता है। समसगढ़ में गर्मियों के दौरान 600 से 800 फीट तक बोरिंग करने पर भी पानी नहीं निकलता है। जबकि उनकी लगभग 35-40 फीट गहरी बावड़ी साल भर पानी बनाए रखती है।

हालांकि सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी केवल बारिश के मौसम में ही उपलब्ध होता है, लेकिन बाकी समय यह बावड़ी बोरवेल के पानी को स्टोर करने का काम करती है। वे बताते है, अगर बावड़ी नहीं होती तो मुझे अलग से कुआं खोदना पड़ता। हम बोरवेल का पानी इसमें भरते है और फिर चार-पांच घंटे तक खेत की सिंचाई हो जाती है। इससे बहुत फायदा मिलता है।

वे बावड़ी को जिंदा रखने के पीछे सफाई को सबसे जरूरी बताते है । अजय कहते हैं अगर सफाई नहीं होगी तो बारिश की मिट्टी अंदर जमा हो जाएगी और पानी का स्रोत बंद हो जाएगा। इसी वजह से हर साल बारिश के बाद बावड़ी की सफाई करवाई जाती है, जिस पर लगभग 5 से 10 हजार रुपए खर्च आते है।

वे बताते हैं कि बावड़ी में सामान्य सीमेंट प्लास्टर नहीं किया जाता क्योंकि उससे बारिश का पानी अंदर नहीं जा पाएगा। हमने पत्थरों के जॉइंट जानबूझकर खुले छोड़े हैं ताकि पानी रिसकर अंदर आता रहे।

अजय मालवी मानते हैं कि बावड़ियों को बचाने के लिए सबसे जरूरी है कि उन्हें खोजा जाए और लोग उनमें रुचि लें। वे कहते हैं, अब लोगों की इन चीजों में दिलचस्पी नहीं रही। जमीन बिक रही है और बावड़ियां खत्म हो रही है। लेकिन अगर सरकार चाहे तो इन्हें ढूंढकर बचाया जा सकता है।

वे आगे कहते है पुरानी बावड़ियों में आज भी पानी है, जबकि यहां की बोरें सूख चुकी है। अगर बाकी बावड़ियां भी बचा ली जाती तो पानी की इतनी समस्या नहीं होती। उनके अनुसार बावड़ियां केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि आज भी जल संकट का व्यावहारिक समाधान है।भोपाल की समसगढ़ बावड़ियों को लेकर पर्यावरण कार्यकर्ता राशिद नूर खान कहते है कि ये बावड़ियां केवल जल स्रोत नहीं बल्कि भोपाल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है, जिन्हें संरक्षित करना बेहद जरूरी है।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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