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किस्सा कड़कनाथ का | प्रेरक पक्षी कथा और मुनमुन की सफलता की कहानी

कड़कनाथों के मुखिया मालू बाड़े में बड़े मजे से अपने साथियों के साथ रहते। आपस में मीठा बतियाते। पूरे परिवार का जीवन खुशी-खुशी बीत रहा था। परिवार में बड़े और बच्चे मिलाकर थे कुल सौ सदस्य। डॉ. रत्ता जी का फार्म हाउस उन्हें अच्छा लग रहा था। रत्ता जी को पशु-पक्षियों और प्रकृति से अपार प्रेम था। वह सबका बहुत ध्यान रखते। इस बाड़े से सटे दूसरे बाड़े में बत्तखें अठखेलियां करती रहतीं। तीसरे बाड़े में देशी गायें थीं। चौथे बाड़े में उनके बच्चे खूब उछल-कूद मचाते रहते। सुबह-शाम उन्हें अपनी माताओं का दुग्धपान करने को मिलता। उस समय उनकी प्रफुल्लता का ठिकाना न रहता। मुंह और गर्दन ऊपर-नीचे करके जल्दी-जल्दी दुग्धपान करना चाहते, लेकिन उन्हें उतना ही मिलता, जितना कि उनके शरीर के लिए आवश्यक था। अधिक दुग्धपान से दस्त लगने की संभावना बनी रहती।

डॉ. रत्ता जी का पूरा नाम दीपक मेहंदी रत्ता था। वे एक कृषि वैज्ञानिक हैं। उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर अपना फार्म हाउस खोलना बेहतर समझा। उनके फार्म हाउस में एक से एक किस्म के देशी-विदेशी पौधे और वृक्ष लगे हैं। फलदार वृक्षों से परिसर शोभायमान है।

कड़कनाथों के मुखिया मालू से उनके बच्चे चिंकी ने पूछा, ‘पापा हमारा रंग काला क्यों है? हमारी प्रजाति के बारे में कुछ विस्तार से बताइए।’ मालू ने प्यार करते हुए बताया, ‘हम पक्षी जाति से हैं। हमें पक्षियों में पवित्र माना जाता है, क्योंकि हम पूरी तरह शाकाहारी भोजन करते हैं। हमें पसंद है गेहूं, मक्का, बाजरा और दलिया आदि। हम खा लेते हैं प्याज, गोभी, बंद गोभी आदि सब्जियों के छिलके और पालक, घास आदि भी। हमारा लालन-पालन मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले से सटे क्षेत्रों बस्तर, राजस्थान और गुजरात के कुछ जिलों में भी बड़े शौक से करते हैं। हमें स्थानीय लोग काला मासी, कड़कनाथ भी कहते हैं। हमारी तीन किस्में हैं -ब्लैक, गोल्डन और पेंसिल। हमें अधिकांश आदिवासी समुदाय के लोग ही पालते हैं। आदिवासी लोग दिवाली के बाद हमारी देवी पर बलि भी चढ़ाते हैं। हमें बहुत पवित्र माना जाता है।’

Manoj Mishra

Editor in Chief

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