छत्तीसगढ़ के जंगलों में हर साल गर्मियों के साथ शुरू होने वाला तेंदूपत्ता संग्रहण सिर्फ एक मौसमी काम नहीं, बल्कि लाखों आदिवासी और वनवासी परिवारों की आजीविका का आधार है. ‘हरा सोना’ कहे जाने वाले तेंदूपत्ते से जुड़ी इस व्यवस्था में इस बार सरकार ने ऐसा कदम उठाया है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा आने की उम्मीद है. संग्रहण दर में बढ़ोतरी, नए फड़ों की स्थापना और पारदर्शी भुगतान व्यवस्था के चलते इस साल तेंदूपत्ता संग्राहकों को करीब 920 करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है. इससे 13 लाख से अधिक परिवारों की आमदनी में सीधा इजाफा होगा.
तेंदूपत्ता: जंगल से जुड़ी आजीविका की रीढ़
छत्तीसगढ़ और आसपास के वन क्षेत्रों में तेंदूपत्ता आदिवासी समाज की जिंदगी का अहम हिस्सा है. बीड़ी उद्योग में इस्तेमाल होने वाले इन पत्तों की मांग हर साल बनी रहती है, और इसी के सहारे हजारों गांवों में गर्मियों के महीनों में रोज़गार मिलता है. खास बात यह है कि इस काम में बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल होती हैं, जिससे परिवार की कुल आय में संतुलन बनता है. यही वजह है कि तेंदूपत्ता संग्रहण को सरकार ग्रामीण रोजगार का मजबूत जरिया मानती है.
संग्रहण दर में बड़ी बढ़ोतरी
इस बार राज्य सरकार ने तेंदूपत्ता संग्रहण दर में अहम बदलाव किया है. वर्ष 2024 से प्रति मानक बोरा मिलने वाली राशि को 4,000 रुपये से बढ़ाकर 5,500 रुपये कर दिया गया है. यह बढ़ोतरी सीधे-सीधे संग्राहकों की जेब में असर डालेगी. जानकारों का कहना है कि इससे पहले बढ़ती महंगाई के मुकाबले संग्रहण की दर कम पड़ रही थी, लेकिन नई दर से मजदूरी और मेहनत का बेहतर मूल्य मिल सकेगा.
13 लाख से अधिक परिवार जुड़े इस काम से
राज्य में तेंदूपत्ता संग्रहण से जुड़े परिवारों की संख्या लगातार बढ़ रही है. इस साल करीब 13 लाख से अधिक संग्राहक परिवार इस व्यवस्था का हिस्सा हैं. खासतौर पर बस्तर संभाग में इसमें तेजी देखी गई है. वर्ष 2025 में जहां 3.90 लाख परिवार जुड़े थे, वहीं इस साल इनकी संख्या बढ़कर 4.04 लाख हो गई है. सिर्फ एक साल में 14,000 से ज्यादा नए परिवार इस काम से जुड़े हैं, जो यह दिखाता है कि तेंदूपत्ता आज भी भरोसेमंद रोज़गार का माध्यम है.
कितना होगा इस साल का संग्रहण
साल 2026 के लिए राज्य की 31 जिला वनोपज सहकारी यूनियनों के अंतर्गत 902 प्राथमिक समितियों में तेंदूपत्ता संग्रहण की योजना बनाई गई है. अनुमान है कि इस वर्ष कुल 15 लाख से अधिक मानक बोरे तेंदूपत्ता एकत्र किया जाएगा. एक मानक बोरे में 1,000 गड्डियां होती हैं और हर गड्डी में 50 पत्ते शामिल रहते हैं. यानी आंकड़ों में जाएं तो यह काम करोड़ों पत्तों से जुड़ा है, जिनकी मेहनत से पूरी सप्लाई चेन चलती है.
बस्तर और अन्य क्षेत्रों की तस्वीर
बस्तर संभाग के 10 जिला यूनियनों के तहत आने वाली 216 समितियों में लगभग 4 लाख मानक बोरा संग्रहण का लक्ष्य तय किया गया है. वहीं प्रदेश के बाकी 21 यूनियनों की 868 समितियों में करीब 11 लाख मानक बोरा संग्रहण होने की संभावना है. बस्तर जैसे दूरदराज़ और संवेदनशील इलाकों में यह काम न केवल आय का जरिया है, बल्कि लोगों को अपने ही क्षेत्र में बने रहने का अवसर भी देता है.
नए फड़, नई उम्मीद
इस साल नारायणपुर के अबूझमाड़ इलाके में पहली बार 10 नए फड़ों की स्थापना की गई है. यहां करीब 2,100 से अधिक मानक बोरा तेंदूपत्ता संग्रहित होने का अनुमान है. इसके साथ ही सुकमा और केशकाल क्षेत्रों में भी नए फड़ जोड़े गए हैं. पिछले साल नक्सल प्रभावित इलाकों में 351 फड़ों पर काम नहीं हो पाया था, लेकिन इस बार प्रशासन ने पहले से तैयारी कर ली है ताकि सभी फड़ों में संग्रहण सुचारु रूप से हो सके.
पारदर्शी व्यवस्था और समय पर भुगतान
तेंदूपत्ता संग्रहण को आसान बनाने के लिए इस बार संग्राहक कार्ड, बोरा, सुतली, गोदाम और परिवहन जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं पर खास ध्यान दिया गया है. पत्तों के भंडारण का बीमा भी कराया जा रहा है, ताकि नुकसान की स्थिति में संग्राहकों पर असर न पड़े. सबसे अहम बदलाव भुगतान व्यवस्था में किया गया है. ऑनलाइन सॉफ्टवेयर के जरिए सीधे डीबीटी प्रणाली से रकम संग्राहकों के बैंक खातों में भेजी जाएगी, जिससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी.
920 करोड़ रुपये से बदलेगी तस्वीर
निर्धारित नई दर के अनुसार इस साल तेंदूपत्ता संग्राहकों को करीब 920 करोड़ रुपये का भुगतान होने का अनुमान है. यह रकम सिर्फ व्यक्तिगत आय नहीं बढ़ाएगी, बल्कि गांवों की पूरी अर्थव्यवस्था को गति देगी. बाजार, छोटे व्यापार और स्थानीय जरूरतों पर इसका सीधा असर पड़ेगा.
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा सहारा
सरकार की यह पहल तेंदूपत्ता को केवल वन उपज तक सीमित नहीं रखती, बल्कि इसे टिकाऊ ग्रामीण विकास से जोड़ती है. बढ़ी हुई दर, बेहतर प्रबंधन और पारदर्शी भुगतान से साफ है कि तेंदूपत्ता संग्रहण आने वाले समय में भी लाखों परिवारों के लिए ‘हरा सोना’ बना रहेगा.





