बुरहानपुर. कहते हैं न कि जब कुछ युवा सपने देखते हैं तो उनको पूरा करने के लिए जी जान लगा देते हैं. इस बात को मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के निंबोला में रहने वाले अनिल बाविसकर ने सच कर दिखाया है. उनके परिवार के लोग उनको इंजीनियर बनना चाहते थे लेकिन उनका बचपन से ही शिक्षक बनने का सपना था.
उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की उसके बाद और शिक्षक बनने के लिए आगे बढ़े और उन्होंने b.Ed b.ed और m.Ed की पढ़ाई की 2006 में नौकरी लगी अभी वह ब्लॉक एकेडमी कोऑर्डिनेटर हैं. उनके पिता एकनाथ बाविसकर और माता प्रमिला बाई द्वारा उनको पढ़ाई लिखाई के लिए बहुत सहयोग किया गया. रिश्तेदारों का भी सहयोग मिला.
शिक्षक अनिल बाविसकर ने जानकारी देते हुए बताया कि माता प्रमिला बाई पिता एकनाथ बाविसकर के यहां पर मेरा जन्म हुआ. परिवार की स्थिति ठीक नहीं थी पिता शिक्षक थे बहुत कम वेतन मिलता था. घर का गुजर बसर करना मुश्किल हो जाता था, घर पर पक्की छत भी नहीं थी खपरैल और टीन का किराए का मकान था. मुझे बचपन से ही पढ़ाई लिखाई से बड़ा शौक था. मेरे माता-पिता मुझे इंजीनियर बनाना चाहते थे लेकिन मैं भी पिता से प्रेरित होकर शिक्षक बनाना चाहता था. घर में बिजली नहीं थी मैं चौराहे पर जलने वाले लैंप की रोशनी में पढ़ाई करता था.अनिल बाविसकर ने जानकारी देते हुए बताया कि माता प्रमिला बाई पिता एकनाथ बाविसकर के यहां पर मेरा जन्म हुआ. परिवार की स्थिति ठीक नहीं थी पिता शिक्षक थे बहुत कम वेतन मिलता था. घर का गुजर बसर करना मुश्किल हो जाता था, घर पर पक्की छत भी नहीं थी खपरैल और टीन का किराए का मकान था. मुझे बचपन से ही पढ़ाई लिखाई से बड़ा शौक था. मेरे माता-पिता मुझे इंजीनियर बनाना चाहते थे लेकिन मैं भी पिता से प्रेरित होकर शिक्षक बनाना चाहता था. घर में बिजली नहीं थी मैं चौराहे पर जलने वाले लैंप की रोशनी में पढ़ाई करता था.
मैंने अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत करना शुरू कर दी. 2006 में मेरी सरकारी नौकरी लगी, मैं 25 साल से शिक्षा विभाग में अपनी सेवा दे रहा हूं. मेरे द्वारा जिले के 700 शासकीय और अशासकीय स्कूलों की मॉनिटरिंग की जाती है. मैं अभी हाल फिलहाल में ब्लॉक एकेडमी कोऑर्डिनेटर के पद पर पदस्थ हूं.
गरीब और मध्यम परिवार के बच्चों की करता हूं मदद
मेरे द्वारा अपने वेतन की राशि से घर खर्च की राशि बचाकर गरीब और बेसहारा और जिन बच्चों के माता-पिता नहीं है, ऐसे बच्चों को शिक्षा ग्रहण कराने के लिए स्कूल सामग्री दिलाई जाती है. अभी तक 25 साल से मैं करीब 50 से 60 बच्चों की मदद कर चुका हूं. मेरा लक्ष्य उनको अच्छी शिक्षा ग्रहण कराना है और समय-समय पर मैं स्कूलों की भी मॉनिटरिंग करते रहता हूं. जहां पर भी विद्यार्थियों से संबंधित कुछ शिकायत मिलती है मैं तत्काल एक्शन लेकर कार्रवाई करता हूं.





