दिल्ली: यह कहानी है अनीश मालपानी की, जिन्होंने 10 साल US में बिताकर फिर अचानक भारत वापस लौटकर कुछ ऐसा कमाल का स्टार्टअप शुरू किया कि जिसके बाद उनकी चर्चा हर जगह होने लगी. अनीश ने भारत वापस लौटकर कचरे में फेंके जाने वाले चिप्स के खाली पैकेट से प्रीमियम चश्मे बनाने का काम शुरू किया और इस स्टार्टअप को उन्होंने ‘विदाउट’ नाम दिया. इस तरह से बने हुए उनके चश्मो की जहां भारत भर में चर्चा हुई वहीं उनकी खरीदारी भी खूब हुई. आइए अब आपको आगे विस्तार से इनकी पूरी कहानी बताते हैं.अनीश ने बातचीत करते हुए बताया कि उन्होंने करीब 10 साल US में बिताए हैं. जिसमें से 5 साल उन्होंने द यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास, अमेरिका से पढ़ाई की जहां उन्होंने फाइनेंस और स्पोर्ट्स मैनेजमेंट की डिग्री हासिल की. और फिर पढ़ाई पूरी करने के बाद 5 साल उन्होंने अमेरिका में अपने करियर की शुरुआत की और आई हार्ट मीडिया नाम की कंपनी में काम किया. वहां उन्होंने फाइनेंशियल एनालिस्ट, सीनियर फाइनेंशियल एनालिस्ट, फाइनेंस मैनेजर और बाद में डायरेक्टर ऑफ फाइनेंस जैसे पदों पर काम कियाउनका कहना था कि जब उन्होंने अपनी आखिरी नौकरी छोड़ी थी तो तब उनकी सालाना कमाई भारतीय 1 करोड़ रुपए के लगभग थी. अपनी इतनी शानदार नौकरी छोड़ने के पीछे का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि वह अच्छा खासा पैसा कमा रहे थे लेकिन उनका मन संतुष्ट नहीं था इसलिए उन्होंने नौकरी छोड़ने का फैसला किया और भारत आ गए.
भारत आकर पहले समस्या समझने की कोशिश की
अनीश ने हमें आगे बताया कि भारत आकर उन्होंने पहले समस्या समझने की कोशिश की कि भारत में इस वक्त कौन सी समस्या ज्यादा बड़ी है, जिस पर वे काम कर सकते हैं. इसी रिसर्च में उनका कहना था कि उनके सामने भारत में बढ़ते प्लास्टिक कचरे की समस्या सामने आई, जिसके बाद उन्होंने इस पर काम करना शुरू किया. फिर उन्होंने आहिस्ता-आहिस्ता खाली चिप्स के पैकेट जो कचरे में फेंक दिए जाते हैं, उनके ऊपर अध्ययन करना शुरू किया और उस अध्ययन के पूरा होने के बाद उन्होंने चिप्स के पैकेट को रिसाइकल करके उनसे प्रीमियम चश्मे बनाना शुरू किया. उनका यह भी कहना था की शुरुआत में उन्हें काफी मुश्किल ए क्योंकि चिप्स के पैकेट जैसे प्लास्टिक से इतनी प्रीमियम किस्म के चश्मे बनाना काफी मुश्किल था और ऐसा पहले ज्यादा कभी हुआ भी नहीं था.
कचरा उठाने वालों को भी दे रहे हैं नौकरी
अनीश ने यह भी बताया कि अब वह करीब 2-3 साल से अपने इन चश्मों को बेच कर करीब 80 से 85 लाख रुपए कमा रहे हैं. उनका कहना था कि इससे ज्यादा खुशी उन्हें इस बात की है कि वह भारत में बढ़ते कचरे की समस्या का समाधान कर पा रहे हैं और वह कचरा उठाने वाले 16 लोगों को अभी अपनी कंपनी में नौकरी दे पा रहे हैं. उन्होंने कहा कि वह है इन कचरा उठाने वाले लोगों को एक समान पूर्वक नौकरी दे रहे हैं और एक फिक्स सैलरी भी दे रहे हैं और अपनी कंपनी के द्वारा वह उनका इंश्योरेंस भी करवाते हैं.
भारत आकर पहले समस्या समझने की कोशिश की
अनीश ने हमें आगे बताया कि भारत आकर उन्होंने पहले समस्या समझने की कोशिश की कि भारत में इस वक्त कौन सी समस्या ज्यादा बड़ी है, जिस पर वे काम कर सकते हैं. इसी रिसर्च में उनका कहना था कि उनके सामने भारत में बढ़ते प्लास्टिक कचरे की समस्या सामने आई, जिसके बाद उन्होंने इस पर काम करना शुरू किया. फिर उन्होंने आहिस्ता-आहिस्ता खाली चिप्स के पैकेट जो कचरे में फेंक दिए जाते हैं, उनके ऊपर अध्ययन करना शुरू किया और उस अध्ययन के पूरा होने के बाद उन्होंने चिप्स के पैकेट को रिसाइकल करके उनसे प्रीमियम चश्मे बनाना शुरू किया. उनका यह भी कहना था की शुरुआत में उन्हें काफी मुश्किल ए क्योंकि चिप्स के पैकेट जैसे प्लास्टिक से इतनी प्रीमियम किस्म के चश्मे बनाना काफी मुश्किल था और ऐसा पहले ज्यादा कभी हुआ भी नहीं था.
कचरा उठाने वालों को भी दे रहे हैं नौकरी
अनीश ने यह भी बताया कि अब वह करीब 2-3 साल से अपने इन चश्मों को बेच कर करीब 80 से 85 लाख रुपए कमा रहे हैं. उनका कहना था कि इससे ज्यादा खुशी उन्हें इस बात की है कि वह भारत में बढ़ते कचरे की समस्या का समाधान कर पा रहे हैं और वह कचरा उठाने वाले 16 लोगों को अभी अपनी कंपनी में नौकरी दे पा रहे हैं. उन्होंने कहा कि वह है इन कचरा उठाने वाले लोगों को एक समान पूर्वक नौकरी दे रहे हैं और एक फिक्स सैलरी भी दे रहे हैं और अपनी कंपनी के द्वारा वह उनका इंश्योरेंस भी करवाते हैं.





