भारत में पक्के मकान का सपना अब सिर्फ सपना नहीं, बल्कि हकीकत बन चुका है. इसके पीछे सरकार का भी अहम योगदान है, क्योंकि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अब सिर्फ शहरों में ही नहीं, बल्कि गांव-गांव में भी पक्के मकान बन रहे हैं. तेजी से बदलते गांवों के भौगोलिक स्वरूप के बीच हमें पुराने मकान बनाने की परंपरा को भी जानना चाहिए. ऐसे में आज हम जानेंगे कि कच्चे मकान कैसे होते थे और उनमें कौन-कौन सी आकृतियां बनाई जाती थीं, जो आज भी हमारी यादें ताजा कर देती हैं.
कच्चे मकान में “गौंखा” वह जगह होती थी, जिसमें घरेलू उपयोग के सामान रखे जाते थे. आज के पक्के मकानों में जैसे दीवारों में अलमारियां बनी होती हैं, उसी तरह कच्चे मकानों में गौंखा बनाया जाता था. ये गौंखे कई प्रकार के होते थे. मंदिरनुमा गौंखा अपने आप में एक अद्भुत संरचना होती थी, जिसका आकार मंदिर जैसा बनाया जाता था. उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में बनाए जाने वाले कच्चे मकानों में अधिकतर नागर शैली के आधार पर गौंखे बनाए जाते थे. इसके अलावा तीन-कोणीय सदाबहार गौंखा भी काफी आकर्षक होता था, जिसमें तीन अलग-अलग कोणों का संतुलन होता था. इसमें दिया आदि सुरक्षित रखा जा सकता था.
टोटा
जिस प्रकार आज पक्के मकानों में छत डालते समय लगभग 2 फीट का छज्जा निकाला जाता है, उसी तरह पहले कच्चे खपरैल मकानों में लकड़ी का छज्जा बनाया जाता था, जिसे ग्रामीण भाषा में “टोटा” कहा जाता था. इसके अलावा कच्चे मकानों में लकड़ी के मजबूत दरवाजे होते थे. आज जहां दरवाजों में लोहे की कुंडी लगाई जाती है, वहीं पहले “बिलनी” लगाई जाती थी, जो दरवाजे को खोलने और बंद करने का काम करती थी.बड़ेर
बड़ेर लकड़ी का एक लंबा और मजबूत टुकड़ा होता था, जिसे नापकर तैयार किया जाता था. इसे मिट्टी के एक पिलर से दूसरे पिलर पर रखा जाता था और इसके ऊपर टोटा, पल्ला आदि रखकर खपरैल छत को सहारा दिया जाता था. छत के निर्माण में इसका बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता था. बड़ेर को आम, नीम और शीशम जैसी मजबूत लकड़ियों से बनाया जाता था.





