छत्तीसगढ़

*कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने वनांचल सहित विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण कर किसानों को दी रोग नियंत्रण की जानकारी*

*धान की फसल में बैक्टीरियल ब्लाइट रोग की निगरानी और एकीकृत प्रबंधन की सलाह*

*कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने वनांचल सहित विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण कर किसानों को दी रोग नियंत्रण की जानकारी*

कवर्धा, सितंबर 2026। धान के कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में खरीफ मौसम के दौरान धान प्रमुख फसल है। कबीरधाम जिले में भी लगभग एक लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में धान की खेती की जाती है। धान की फसल में विभिन्न प्रकार के रोगों का प्रकोप देखा जाता है, जिनमें झुलसा, भूरा धब्बा, बैक्टीरियल ब्लाइट, फाल्स स्मट और शीथ रॉट सहित शीथ ब्लाइट प्रमुख हैं।

किसानों को फसल में होने वाले रोगों की समय पर पहचान और एकीकृत प्रबंधन के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से कृषि विज्ञान केन्द्र, कवर्धा के वैज्ञानिकों द्वारा जिले के वनांचल सहित विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण किया गया। भ्रमण के दौरान कई क्षेत्रों में धान की फसल में बैक्टीरियल ब्लाइट (जीवाणु झुलसा) रोग के लक्षण दिखाई दिए। वैज्ञानिकों ने किसानों को रोग की पहचान, रोग बढ़ने की परिस्थितियों तथा एकीकृत प्रबंधन के संबंध में आवश्यक सलाह दी है।

*ऐसे करें बैक्टीरियल ब्लाइट रोग की पहचान*

वैज्ञानिकों के अनुसार रोग की शुरुआत में धान की पत्तियों के किनारों अथवा सिरों से पानी जैसे धब्बे दिखाई देते हैं। बाद में ये धब्बे पीले-हरे रंग की धारियों में बदलने लगते हैं। रोग बढ़ने पर पत्ती का किनारा एवं सिरा पीला होकर सूखने लगता है और यह सूखापन धीरे-धीरे पत्ती के नीचे की ओर बढ़ता है। सुबह के समय नई संक्रमित पत्तियों पर बैक्टीरियल ओज के रूप में चिपचिपा या दूधिया पदार्थ भी दिखाई दे सकता है। पौध अवस्था में गंभीर संक्रमण होने पर पौधे मुरझाकर सूख सकते हैं।

*अधिक नत्रजन और खेत में नमी से बढ़ सकता है रोग*

कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि खेत में अत्यधिक नत्रजन यानी यूरिया का प्रयोग, लंबे समय तक पानी भरा रहना, तेज हवा एवं बारिश तथा अधिक नमी जैसी परिस्थितियां बैक्टीरियल ब्लाइट के प्रसार को बढ़ावा दे सकती हैं। इसलिए किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के साथ खेत में उचित जल प्रबंधन बनाए रखने की सलाह दी गई है।

*किसानों के लिए एकीकृत प्रबंधन की सलाह*

रोगग्रस्त खेतों में अत्यधिक नत्रजन या यूरिया का प्रयोग नहीं करने की सलाह दी गई है। खेत में लंबे समय तक पानी जमा न रहने दें और आवश्यकता के अनुसार जल निकासी की व्यवस्था करें। नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश का संतुलित मात्रा में प्रयोग करें। रोगग्रस्त पौध अवशेषों को खेत में अगले मौसम के लिए न छोड़ें तथा आगामी फसल के लिए स्वस्थ एवं प्रमाणित बीज का उपयोग करें। जैविक विकल्प के रूप में स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस आधारित जैव-एजेंट का उपयोग भी एकीकृत प्रबंधन में किया जा सकता है।

*रोग दिखाई देने पर तत्काल शुरू करें प्रबंधन*

कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि रोग की शुरुआती अवस्था में ही खेत का निरीक्षण कर प्रबंधन के उपाय शुरू करें। प्रकोप अधिक होने पर कृषि वैज्ञानिकों की अनुशंसा के अनुसार कॉपर ऑक्सीक्लोराइड एवं स्ट्रेप्टोसाइक्लीन अथवा कासुगामाइसिन का छिड़काव किया जा सकता है। साथ ही प्रति एकड़ 10 किलोग्राम पोटाश का छिड़काव करने की सलाह दी गई है। किसानों को विशेष रूप से निर्देशित किया गया है कि अलग-अलग रसायनों को बिना अनुशंसा के आपस में मिलाकर छिड़काव न करें। कृषि विज्ञान केन्द्र, कवर्धा के वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की है कि धान की फसल में रोग के लक्षण दिखाई देने पर स्वयं अनुमान के आधार पर रसायनों का प्रयोग न करें। रोग की सही पहचान एवं निदान के लिए अपने ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी अथवा कृषि वैज्ञानिकों से संपर्क करें। समय पर रोग की पहचान, संतुलित उर्वरक उपयोग, उचित जल प्रबंधन और अनुशंसित उपायों को अपनाकर धान की फसल को रोगों से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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