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दीनबंधु मॉडल फेल, ईंट-सीमेंट के बदले अब प्लास्टिक टैंक में बनेगी गोबर गैस

गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों के बीच बिहार में एक बार फिर से गोबर गैस प्लांट लगाने की योजना पर जोर दिया जा रहा है। कृषि विभाग की ओर से ग्रामीण इलाकों में 50 प्रतिशत अनुदान पर गोबर गैस प्लांट लगाने के लिए आवेदन मांगे जा रहे हैं। 42 हजार रुपए की लागत पर गोबर गैस प्लांट लगाए जा रहे हैं, इसमें 22500 रुपए अनुदान दिया जाता है। गोबर गैस प्लांट लगाने का तरीका बदल जाएगा। अब राज्य में दीनबंधु मॉडल के बदले प्लास्टिक टैंक में गोबर गैस बनेगी। क्योंकि दीनबंधु मॉडल का गोबर गैस प्लांट बनाने वाले कारीगर गांवों में नहीं मिल रहे हैं।

इस कारण ग्रामीण इलाकों में कभी बेहद लोकप्रिय रहा गोबर गैस (बायोगैस) का पारंपरिक दीनबंधु मॉडल अब दम तोड़ चुका है। सरकार की कोशिशों और सब्सिडी के बावजूद गांवों में इस मॉडल के प्लांट लगाने के लिए कुशल कारीगर ही नहीं मिल रहे हैं। आलम यह है कि पिछले एक साल में पूरे राज्य में महज 16 लोगों ने ही इस मॉडल के तहत गोबर गैस प्लांट लगवाया है। इस संकट को देखते हुए अब रणनीति बदली है। अब जमीन के नीचे ईंट-सीमेंट का ढांचा बनाने के बजाय छतों पर रखी जाने वाली पानी की टंकियों की तर्ज पर रेडीमेड पीवीसी/एचडीपीई बायोगैस प्लांट को बढ़ावा दिया जाएगा।

अब प्लास्टिक टैंक मॉडल तीन घंटे में हो जाएगा इंस्टॉल

पारंपरिक मॉडल के फेल होने के बाद अब सरकार और एजेंसियां प्री-फैब्रिकेटेड (रेडीमेड) पोर्टेबल बायोगैस प्लांट पर फोकस कर रही हैं, जो प्लास्टिक टैंक पानी की टंकी जैसे दिखते हैं। इस नए मॉडल के लिए किसी राजमिस्त्री की जरूरत नहीं होती। कंपनी से रेडीमेड टैंक आता है, जिसे प्लंबर या कंपनी का नुमाइंदा महज तीन घंटे में असेंबल करके चालू कर देता है। यह हाई-डेंसिटी प्लास्टिक से बना होता है, जिससे गैस लीकेज की संभावना शून्य हो जाती है। अगर कभी कोई खराबी आती भी है, तो यह जमीन के ऊपर होने से तुरंत पकड़ी और सुधारी जा सकती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पोर्टेबल है। अगर कोई किसान या ग्रामीण घर या जगह बदलता है तो इसे आसानी से दूसरी जगह शिफ्ट किया जा सकता है।

क्यों फ्लॉप हो गया दीनबंधु मॉडल?

दीनबंधु मॉडल जमीन के नीचे ईंट और कंक्रीट से बनने वाला फिक्स्ड-डोम स्ट्रक्चर है। इसके फेल होने के पीछे तीन बड़े कारण सामने आए हैं। इस प्लांट को बनाने के लिए खास तकनीकी समझ वाले राजमिस्त्रियों की जरूरत होती है, ताकि गैस का प्रेशर सही बने। गांवों में अब ऐसे कारीगर ढूंढने से भी नहीं मिल रहे। यदि जमीन के नीचे बने इस पक्के स्ट्रक्चर में हल्का सा भी क्रैक आ जाए, तो गैस बनना बंद हो जाती है।

दूसरा कारण जमीन के नीचे लीकेज कहां है, यह पता लगाना और उसे ठीक करना बेहद खर्चीला और मुश्किल का काम है। तीसरा कारण इसे बनाने और चालू होने में कम से कम 15 से 20 दिन का समय लगता था और यह एक बार जहां बन गया, वहां की जमीन हमेशा के लिए ब्लॉक हो जाती थी।

 

 

Manoj Mishra

Editor in Chief

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