जब लोग कहते हैं कि मेहनत का फल देर से सही मिलता जरूर है। सौम्या मिश्रा उसकी जीती-जागती मिसाल हैं। कई असफलताओं, लगातार कोशिशों और नौकरी के साथ पढ़ाई का संतुलन बनाते हुए उन्होंने वह मुकाम हासिल किया, जिसका सपना हर साल लाखों युवा देखते हैं। जी हां हम बात कर करें हैं देश की सबसे कठिन परीक्षा मानी जाने वाली संघ लोक सेवा आयोग ( ) में सफलता पाने की।
छोटे शहर से बड़े सपनों तक का सफर
उत्तर प्रदेश के उन्नाव से ताल्लुक रखने वाली सौम्या ने अपनी स्कूली पढ़ाई से लेकर उच्च शिक्षा तक का सफर दिल्ली में पूरा किया। उनके पिता राघवेंद्र मिश्रा हिंदी के प्रोफेसर हैं, जबकि माँ रेनू मिश्रा गृहिणी हैं। परिवार का माहौल पढ़ाई और अनुशासन से भरा था, और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। सौम्या खुद मानती हैं कि अगर परिवार का भरोसा और समर्थन न होता, तो यह सफर इतना लंबा तय करना आसान नहीं था।
पहले PCS, फिर UPSC
UPSC में सफलता से पहले सौम्या ने राज्य सेवा परीक्षा (PCS) 2021 में शानदार प्रदर्शन किया था और दूसरी रैंक हासिल की थी। इसके बाद वह उपजिलाधिकारी (SDM) के रूप में मिर्जापुर के मड़िहान क्षेत्र में तैनात रहीं। यानी जब बाकी अभ्यर्थी किताबों से प्रशासन समझ रहे थे, तब सौम्या ज़मीनी स्तर पर उसे जी रही थीं। सरकारी जिम्मेदारियों के साथ पढ़ाई करना आसान नहीं था, लेकिन यही अनुभव आगे चलकर उनके उत्तर लेखन और समझ में काम आया।
तीन बार असफलता, चौथी बार मिली ऐतिहासिक सफलता
UPSC की तैयारी में उनका रास्ता बिल्कुल सीधा नहीं था। पहले तीन प्रयासों में कभी प्रारंभिक परीक्षा में रुकावट आई, तो कभी इंटरव्यू चरण पार नहीं हो सका। लेकिन उन्होंने हार को विराम नहीं बनने दिया। चौथे प्रयास में उन्होंने ऑल इंडिया रैंक 18 हासिल कर दिखाया कि लगातार सुधार और धैर्य से ही मंज़िल मिलती है।
ड्यूटी निभाते हुए की तैयारी
तैयारी के दौरान उन्हें तत्कालीन जिलाधिकारी प्रियंका निरंजन से महत्वपूर्ण मार्गदर्शन मिला। उन्होंने न सिर्फ प्रेरित किया, बल्कि आधिकारिक जिम्मेदारियों का बेहतर प्रबंधन कर सौम्या को पढ़ाई के लिए समय भी उपलब्ध कराया। यह सहयोग उनके लिए निर्णायक साबित हुआ, क्योंकि नौकरी और तैयारी का संतुलन ही सबसे बड़ी चुनौती था।
हर अभ्यर्थी का रास्ता अलग होता है
UPSC की दुनिया में हर सफलता की कहानी अलग होती है। जहां सौम्या शर्मा ने श्रवण बाधा जैसी चुनौती के बावजूद पहले ही प्रयास में AIR 9 हासिल किया, वहीं सौम्या पांडेय ने भी पहली कोशिश में शानदार सफलता पाई। दूसरी ओर, परी बिश्नोई जैसी अधिकारियों की तरह सौम्या मिश्रा का सफर कई चरणों में संघर्ष से होकर गुजारा। इन उदाहरणों से यह साफ होता है कि UPSC में सफलता का कोई एक तय फार्मूला नहीं होता, किसी को पहली बार में मिलती है, तो किसी को कई बार गिरकर उठना पड़ता है।
असफलता को ‘रुकावट’ नहीं, ‘सुधार का मौका’ मानो
एक इंटरव्यू में सौम्या ने कहा कि असफल होने के बाद सबसे बड़ी गलती है निराश होकर बैठ जाना। उन्होंने अभ्यर्थियों को सलाह दी कि हर प्रयास के बाद अपनी गलतियों का विश्लेषण करें, रणनीति बदलें, और सकारात्मक सोच बनाए रखें। उनका मानना है कि UPSC सिर्फ ज्ञान की परीक्षा नहीं है, बल्कि धैर्य, मानसिक मजबूती और निरंतरता की भी परीक्षा है। सौम्या मिश्रा की कहानी बताती है कि सफलता अचानक नहीं मिलती। इसके पीछे वर्षों की मेहनत, असफलताओं से सीखने का साहस, परिवार का भरोसा और सही समय पर मिला मार्गदर्शन होता है। उनकी यात्रा उन लाखों अभ्यर्थियों के लिए प्रेरणा है जो बार-बार प्रयास कर रहे हैं और अब भी अपने सपने को थामे हुए हैं।





