सर्दी का मौसम आते ही गांव की असली रौनक देखने लायक हो जाती है. खेतों से लौटते लोग, आंगन में जलता चूल्हा और उस पर सिकती मक्का की रोटी… बस यही है असली देसी लाइफ. जैसे ही ठंडी हवा चलती है, वैसे ही गांवों में देसी खाने की खुशबू पूरे माहौल को महका देती है. चूल्हे पर जब मक्का की रोटी सेंकी जाती है, तो उसकी खुशबू दूर-दूर तक फैल जाती है. उड़द की दाल और चना की भाजी के साथ गरम-गरम मक्का की रोटी, ऊपर से शुद्ध देसी घी और लहसुन, हरी मिर्च, टमाटर की चटनी भाई साहब, ऐसा खाना खा लिया तो होटल-रेस्टोरेंट का नाम भी भूल जाओगे.आजकल लोग बड़े-बड़े होटल और रेस्टोरेंट में हजारों रुपये खर्च कर देते हैं, लेकिन वहां न पेट भरता है और न दिल. प्लेट में सजावट ज्यादा होती है और खाने में स्वाद कम. ऊपर से न जाने कौन सा तेल, कौन सा मसाला. वहीं गांव का देसी खाना बिना मिलावट, बिना दिखावे के सीधे दिल तक पहुंचता है. गांव में बना खाना पेट के साथ-साथ शरीर और मन दोनों को तंदुरुस्त रखता है. यही वजह है कि गांव के लोग आज भी होटल के खाने को ज्यादा भाव नहीं देते.ग्रामीण इलाकों में लोग मौसम देखकर ही खाना बनाते हैं. सर्दियों में उड़द की दाल और चना की भाजी को मिलाकर जो दाल बनती है, वह ताकत का खजाना होती है. इस दाल के साथ अगर मक्का की रोटी मिल जाए तो समझो दावत पूरी. गांव में बुजुर्ग कहते हैं कि मक्का की रोटी और उड़द-चना की दाल साथ हो तो ठंड पास भी नहीं फटकती. यह खाना मजदूर से लेकर किसान तक सबको पूरा दिन ऊर्जा देता है.मक्का की रोटी बनाना भी कोई आसान काम नहीं है. मोटे मक्के के आटे को हाथों से थपथपाकर रोटी बनाई जाती है, फिर चूल्हे की आंच पर धीरे-धीरे सेकी जाती है. जब रोटी फूलकर तैयार हो जाती है और उस पर देसी घी डाला जाता है, तब जो खुशबू आती है, उसके आगे होटल के बटर नान भी फीके पड़ जाते हैं. होटल में घी के नाम पर मक्खन या रिफाइंड मिल जाता है, जबकि गांव में शुद्ध देसी घी मिलता है, जो सेहत भी बनाता है और स्वाद भी.
इसके साथ बनने वाली लहसुन, हरी मिर्च और टमाटर की चटनी तो जैसे जान ही डाल देती है. भजनलाल आदिवासी बताते है कि सर्दी के मौसम में लहसुन वैसे भी रामबाण माना जाता है. गांव के लोग कहते हैं कि लहसुन की चटनी खा ली तो सर्दी-जुकाम पास नहीं आता. गरम-गरम मक्का की रोटी, देसी घी, उड़द-चना की दाल और तीखी चटनी एक कौर खाते ही मुंह में पानी आ जाता है और बार-बार खाने का मन करता है.
धर्मेंद्र आदिवासी ने कहा कि मक्का की रोटी बहुत स्वादिष्ट है हम पुराने खान-पान और रीति-रिवाजों को सीने से लगाए हुए हैं. उन्हें दिखावे की नहीं, स्वाद और सेहत की जरूरत है. यही वजह है कि गांव का देसी खाना आज भी वैसा ही है, जैसा सालों पहले था. साफ-सुथरा, सादा और दमदार. सच कहा जाए तो गांव की मक्का रोटी के आगे बड़े-बड़े होटल और रेस्टोरेंट सिर्फ नाम के रह जाते हैं. देसी चूल्हे का खाना ही असली राजा है, बाकी सब बस दिखावा.





