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बीएससी-बीएड की डिग्री से नहीं, इस काम से मिला दाम…₹2 लाख से सीधे ₹40 लाख की छलांग, कैसे?

नई दिल्‍ली: बीकानेर के छोटे से गांव फुलडेसर के मुकेश गर्वा ने आधुनिक खेती की ताकत से अपनी किस्मत बदल दी है। B.Sc. और B.Ed. कर चुके मुकेश ने दो हेक्टेयर की पुश्तैनी जमीन पर होने वाली 2-3 लाख रुपये की पारंपरिक मूंगफली-सरसों की खेती को छोड़ दिया। उन्होंने कृषि विभाग के प्रशिक्षण शिविरों से प्रेरित होकर पॉलीहाउस तकनीक अपनाई। तीन पॉलीहाउस में खीरे और बेमौसमी सब्जियों की खेती और ड्रिप सिंचाई जैसी वैज्ञानिक विधियों का इस्‍तेमाल करके मुकेश ने अपनी सालाना इनकम 10 गुना से ज्‍यादा बढ़ाकर 40 लाख रुपये तक पहुंचा दी है। आज वह अपने गांव के युवाओं के लिए न केवल एक सफल किसान बल्कि रोजगार और नवाचार का प्रतीक बन चुके हैं। आइए, यहां मुकेश गर्वा की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।बीकानेर की लूणकरणसर तहसील के फूलदेसर गांव के मुकेश गर्वा की कहानी निराशा को आशा में बदलने की है। एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे मुकेश ने बीएससी और बीएड की डिग्री ली। लेकिन, उनके पास आजीविका का साधन केवल दो हेक्टेयर पुश्तैनी जमीन थी। इस जमीन पर पारंपरिक रूप से मूंगफली और सरसों की खेती होती थी। इसकी सालाना आय सिर्फ 2 लाख से 3 लाख रुपये थी। यह इनकम परिवार के भरण-पोषण के लिए भी नाकाफी थी। मौसम पर अत्यधिक निर्भरता, उत्पादन की ऊंची लागत और लगातार बारिश या सूखे का डर मुकेश को पारंपरिक खेती से दूर ले गया। उन्होंने महसूस किया कि केवल शिक्षा का इस्‍तेमाल करके ही इस आर्थिक कमजोरी को दूर किया जा सकता है। इसके बाद उन्होंने खेती में कुछ नया करने का फैसला किया।अपने शैक्षणिक ज्ञान का लाभ उठाते हुए मुकेश ने कृषि विभाग की ओर से आयोजित प्रशिक्षण शिविरों में भाग लेना शुरू किया। यहीं से उन्हें प्रोटेक्‍टेड फार्मिंग यानी संरक्षित खेती की नई दिशा मिली। कृषि विभाग की मदद से उन्होंने 4,000 वर्ग मीटर के तीन पॉलीहाउस स्थापित किए और उसमें खीरे की खेती शुरू की। पॉलीहाउस का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह किसान को मौसम पर नियंत्रण देता है। इससे मुकेश बेमौसमी खीरा और अन्य सब्जियां (जैसे टिंडा और तोरई) उगा सके। बेमौसमी फसलों की बाजार में ऊंची मांग होती है। इससे उन्हें अपनी उपज के लिए बेतहर मूल्य मिलने लगा।राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्र में खेती की सफलता के लिए जल प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती है। मुकेश ने इसका समाधान ड्रिप सिंचाई प्रणाली अपनाकर किया। इससे पानी की बर्बादी शून्य हो गई। इसके अलावा, उन्होंने 118×118 फीट का गहरा गड्ढा खोदकर रेनवाटर हार्वेस्टिंग (वर्षा जल संचयन) की व्यवस्था की। वह पॉलीहाउस की छत से बारिश का पानी जमा करते हैं और सिंचाई में इस्‍तेमाल करते हैं। इससे पानी की कमी दूर हो गई और उत्पादन लागत कम हुई। इन आधुनिक तकनीकों के बल पर मुकेश के तीन पॉलीहाउस से सालाना 2,400 क्‍व‍िंटल खीरे का उत्पादन होने लगा। 2,500 रुपये प्रति क्‍व‍िंटल के औसत बाजार मूल्य पर उनकी कुल आय लगभग 60 लाख रुपये पहुंची। इसमें से उत्पादन लागत (18 लाख रुपये) घटाने के बाद शुद्ध वार्षिक आय 42 लाख रुपये दर्ज की गई।मुकेश गर्वा की कड़ी मेहनत और तकनीकी समझ ने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति बदली है, बल्कि पूरे गांव की सोच को भी बदल दिया है। जब उन्होंने पारंपरिक खेती छोड़ पॉलीहाउस अपनाया था तो गांव वालों ने इसे एक जोखिम भरा कदम माना था। लेकिन, आज बंपर इनकम के साथ वह गांव के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन चुके हैं। उन्होंने अब कई स्थानीय मजदूरों को भी रोजगार दिया है। इसमें पॉलीहाउस प्रबंधन, सिंचाई, पैकेजिंग और मार्केटिंग जैसे काम शामिल हैं। इस तरह मुकेश गर्वा ने साबित कर दिया है कि आधुनिक कृषि और नवाचार ग्रामीण क्षेत्रों में समृद्धि और रोजगार का सशक्त जरिया बन सकता है।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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