कबीरधाम: पंडरिया ब्लॉक के भेलिनदादर और रूखमीदादर गांवों के ग्रामीण शासन प्रशासन से नाराज है. वे कहते हैं कि नेता वोट मांगने तो आते हैं लेकिन पानी बिजली की उनकी समस्या पर कोई ध्यान नहीं देता. यहां बसने वाले लोग झिरिया का पानी पीते हैं और ढिबरी जलाकर रात का अंधेरा काटते हैं.
2 किलोमीटर चलकर खाई में उतरकर झिरिया से बुझाते हैं प्यास
कबीरधाम जिला मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर दूर पहाड़ी इलाकों में बसे इन गांवों में सैकड़ों की संख्या में बैगा जनजाति के लोग निवास करते हैं. ग्राम पंचायत कांदावानी का आश्रित गांव रूखमीदादर है. गांव की जनसंख्या 350 है. लेकिन मूलभूत सुविधाओं की कमी है. पीने के पानी के लिए गांव की महिलाओं को हर रोज करीब 2 किलोमीटर पैदल चलकर पहाड़ से लगभग 100 फीट नीचे खाई में उतरना पड़ता है. जहां झिरिया (छोटा जलस्रोत) से वे बूंद बूंद पानी इकट्ठा करती है, फिर उसे सिर पर ढोकर घर तक ले जाती है.
झिरिया के पानी से ही महिलाएं अपना दैनिक काम जैसे कपड़े धोना, नहाना और बर्तन साफ करना करती है. महिलाएं कहती है कि पानी की कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण मजबूरी में उन्हें इतनी मुश्किल झेलनी पड़ती है.
पानी के लिए कितनी परेशानी झेलती हैं महिलाएं
भेलिनदादर की ग्रामीण महिला बताती है कि गांव में पानी की कोई व्यवस्था नहीं है, इसलिए उन्हें 100 फीट गहरी खाई में उतरकर झिरिया से ही पानी ले जाना पड़ता है. वे कहती हैं कि तकलीफ तो है लेकिन प्यास बुझाने के लिए और कोई व्यवस्था नहीं है. सरकार के खिलाफ नाराजगी जताते हुए फूल बाई कहती हैं कि सरकार कभी उनके गांव आती ही नहीं है. कभी कभी अधिकारी गांव आते हैं, लेकिन पानी की समस्या दूर नहीं हुई है.
झिरिया का पानी भरते हैं. छोटे बच्चे के साथ पानी भरने आते हैं. डर भी लगता है. पूरा दिन पीने के पानी की व्यवस्था करने में ही बीत जाता है- भेलिनदादार की ग्रामीण महिला
ऊबड़ खाबड़ रास्ते से रोज पानी भरने आते हैं. एक गुंडी पानी में ही गुजारा करना पड़ता है-फूल बाई
भीषण गर्मी में झिरिया का पानी भी नहीं मिलता
ग्रामीण बताते हैं कि एक छोटे बर्तन को भरने में भी घंटों का समय लग जाता है. गर्मी के मौसम में हालात और भी भयावह हो जाते हैं, जब ये झिरिया भी सूखने लगते हैं. ग्रामीणों के सामने पानी का गंभीर संकट खड़ा हो जाता है.
झिरिया का पानी पीते हैं. नीचे घाट पर जाकर कंधों पर पानी ढोते हैं- बलराम, ग्रामीण
12 महीने झिरिया का पानी पीने को मजबूर हैं. बोर हो जाता तो अच्छा रहता-जोहनलाल
गांव में बिजली भी नहीं, बैटरी लाइट या ढिबरी से करते हैं रोशनी
भेलिनदादर और रूखमीदादर गांव में ना सिर्फ पानी बल्कि बिजली की भी समस्या है. गांव में अब तक बिजली के खंभे नहीं लगे हैं. सोलर प्लेट्स लगाई गई है. जिससे कभी कभी 1 या 2 घंटे के लिए बिजली मिलती है. आंधी तूफान या बारिश के मौसम में अंधेरे में ही उनकी रात गुजरती है.
बिजली भी नहीं है. रात को बैटरी की लाइट या चिमनी जलाना पड़ता है. बैटरी खत्म होने पर अंधेरे में ही रहना पड़ता है-फूल बाई
बिजली पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है. सौर ऊर्जा प्लेट से काम चलता है, वो भी ठीक से काम नहीं करता है. एक दो घंटा ही चलता है-बलराम, ग्रामीण
नेताओं पर ग्रामीणों का गुस्सा
आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए सरकार कई योजनाएं संचालित कर रही है. लेकिन इन गांवों तक उनका लाभ अब तक नहीं पहुंच पाया है. स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार शिकायत और मांग के बावजूद समस्या जस की तस बनी हुई है. गांव के जोहनलाल कहते हैं कि हमारे गांव में बहुत समस्या है. कई बार मांग किए हैं, लेकिन कोई नहीं सुनता. नेता सिर्फ वोट मांगने आते हैं. 12 महीने झिरिया का पानी पीने को मजबूर हैं. बोर हो जाता तो अच्छा रहता. बिजली आती तो हम अच्छे से जी पाते. वे कहते हैं कि आखिर कब तक बूंद बूंद पानी के लिए तरसते रहेंगे.
हमारी मांग है कि पानी और बिजली की समस्या का हल निकालें-बलराम, ग्रामीण
गांव में सड़क लेकिन बाजार नहीं
पानी, बिजली की समस्या से परेशान ग्रामीणों के लिए राहत की बात ये रही कि उनके गांव तक सड़क पहुंची हुई है. लेकिन गांव के आसपास कोई बाजार नहीं है, जिससे जरूरत की चीजें खरीदने के लिए दूसरे गांव जाना पड़ता है. गांव की महिलाओं ने ये भी बताया कि उन्हें राशन भी मिल रहा है और हर महीने महतारी वंदन योजना का लाभ भी मिल रहा है, लेकिन पानी की किल्लत से वे बहुत परेशान हैं.





