रायबरेली: जिले के 70 साल के एक बुजुर्ग ने दोबारा हाईस्कूल की परीक्षा दी है. परीक्षा देने की वजह भी बड़ी अनोखी है. वह चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के पाली भाषा के शिलालेख पढ़कर समझना चाहते हैं. जुनूनी बुजुर्ग ने हाईस्कूल में पाली भाषा की परीक्षा 86 फीसदी अंकों के साथ उत्तीर्ण की है. उनका यह जज्बा बेहद काबिलेतारीफ है. चलिए आगे आपको विस्तार से उनके बारे में बताते हैं.
शुरुआती पढ़ाई कहां हुई: राजाराम बताते हैं कि वह मूल रूप से पंजाब के मोगा के रहने वाले हैं. उनका जन्म 11 दिसंबर 1956 को हुआ था. उन्होंने अपनी स्नातक की शिक्षा पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ और परास्नातक (PG) की पढ़ाई हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी, शिमला से की थी. एक सुशिक्षित पृष्ठभूमि के बावजूद उनके मन में अपनी जड़ों और पूर्वजों (चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक मौर्य) के इतिहास को गहराई से जानने की इच्छा हमेशा से थी.
परीक्षा देने के पीछे की वजह क्या है:राजाराम मौर्या बताते हैं कि मेरे पूर्वज सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक मौर्य के शिलालेख पाली भाषा में हैं. उन शिलालेखों में क्या लिखा है, इसे स्वयं पढ़ने और समझने की जिज्ञासा ने मुझे इस उम्र में फिर से छात्र बनने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने पाली भाषा का चुनाव विशेष रूप से इसी ऐतिहासिक जुड़ाव के कारण किया हैराजाराम मौर्य बताते हैं कि 5 मार्च 1981 को पंजाब नेशनल बैंक में क्लर्क कम कैशियर के रूप में अपना करियर शुरू किया था. अपनी सेवा के दौरान उन्होंने रायबरेली सहित विभिन्न शहरों में अपनी जिम्मेदारियां निभाईं और अंततः 31 दिसंबर 2016 को पीएनबी के स्टाफ ट्रेनिंग सेंटर, विभूति खंड, गोमती नगर (लखनऊ) से सेवानिवृत्त हुए.परिवार में कौन-कौन है:उनका पूरा परिवार शिक्षा के प्रति समर्पित है. उनकी पत्नी अंजू बाला के साथ मिलकर उन्होंने अपने बच्चों को उच्च पदों पर पहुंचाया है. उनकी बड़ी बेटी आरती मौर्य कानपुर देहात में प्रधानाध्यापिका हैं. दूसरी बेटी मीनाक्षी केंद्रीय विद्यालय में अध्यापिका हैं. तीसरी बेटी बीनू सहायक अध्यापिका हैं. बेटा अमित विक्रम सीनियर इंजीनियर है और बहू लवली बेंगलुरु की एक कंपनी में HR पद पर कार्यरत हैं. सबसे छोटी बेटी डॉली लखनऊ के प्रतिष्ठित स्कूल में अध्यापिका हैं.
पहली बार कब दी थी हाईस्कूल की परीक्षा:1974 में पहली बार 62% अंकों के साथ हाईस्कूल पास करने वाले राजाराम का कहना है कि तब और अब की शिक्षा प्रणाली में काफी बदलाव आया है. पहले उत्तर वर्णनात्मक होते थे, जिससे ज्यादा अंक लाना कठिन था, लेकिन अब वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के कारण अच्छे अंक प्राप्त करना आसान हो गया है.
क्या संदेश दिया:अपनी इस सफलता से राजाराम मौर्य ने यह संदेश दिया है कि शिक्षा किसी जाति, धर्म या उम्र की मोहताज नहीं होती. यदि मन में कुछ सीखने का जज्बा हो तो सेवानिवृत्ति के बाद भी ज्ञान के नए क्षितिज छुए जा सकते हैं. आज रायबरेली ही नहीं, बल्कि पूरा प्रदेश उनकी इस इच्छाशक्ति की सराहना हो रही है.





