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शब्दयात्री: एक स्टेशन का खयाल आया और बस गया मालगुड़ी | आर.के. नारायण

कभी एक छोटे-से रेलवे स्टेशन से शुरू हुई थी आर. के. नारायण की कल्पना। आगे चलकर उसी स्टेशन के आसपास एक पूरा कस्बा बस गया। वहां स्कूल था, बाजार था, घर-परिवार थे, अपनी छोटी-बड़ी चिंताओं में उलझे लोग थे। इस कस्बे का नाम था मालगुड़ी। वह दुनिया के नक्शे पर कहीं नहीं था, लेकिन साहित्य के पाठकों के लिए धीरे-धीरे एक पहचानी हुई जगह बन गया।

आर. के. नारायण ने अपनी आत्मकथा My Days में मालगुड़ी के जन्म से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग लिखा है। सितंबर 1930 में उनकी दादी ने पंचांग देखकर लेखन शुरू करने के लिए एक शुभ दिन चुना। नारायण एक कॉपी लेकर बैठे। क्या लिखें, यह तय नहीं था। तभी उनकी कल्पना में एक छोटा-सा रेलवे स्टेशन उभरा। उसके साथ एक लड़का भी आया – स्वामीनाथन। आगे चलकर यही लड़का उनके पहले उपन्यास Swami and Friends का केंद्रीय पात्र बना।

उस समय नारायण के सामने किसी काल्पनिक शहर की पूरी तस्वीर नहीं थी। एक छोटा-सा स्टेशन था, वहां आने-जाने वाली रेलगाड़ियां थीं और एक लड़का था। बाकी दुनिया लिखते हुए बनती गई। गलियां, घर, स्कूल, दुकानें और उनमें रहने वाले लोग धीरे-धीरे उस कस्बे का हिस्सा होते चले गए। मालगुड़ी का जन्म किसी तैयार नक्शे से नहीं, एक दृश्य से हुआ था।

आर. के. नारायण और मालगुड़ी की शुरुआत

1906 में जन्मे आर. के. नारायण का पूरा नाम रासीपुरम कृष्णस्वामी अय्यर नारायणस्वामी (Rasipuram Krishnaswami Iyer Narayanaswami) था। आर. के. नारायण अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीय साहित्यकारों में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। उनका पहला उपन्यास Swami and Friends 1935 में प्रकाशित हुआ। इसी के साथ पाठकों का परिचय मालगुड़ी से हुआ। बाद की रचनाओं में यह कस्बा बार-बार लौटता रहा। उसके लोग बदलते रहे, उनकी परेशानियां और इच्छाएं बदलती रहीं, लेकिन उस जगह की पहचान बनी रही।

मालगुड़ी की खूबी यह थी कि वह किसी एक कहानी तक सीमित नहीं था। वहां का एक पात्र दूसरी कहानी में न भी आए, तब भी पाठक को लगता था कि वह उसी परिचित दुनिया में लौट रहा है। जैसे किसी कस्बे में रहने वाले हर व्यक्ति की अपनी जिंदगी होती है, लेकिन उसकी जिंदगी आसपास के लोगों से भी जुड़ी रहती है। नारायण ने अपने काल्पनिक कस्बे को कुछ इसी तरह रचा।

उनकी कहानियों और उपन्यासों में ऐसे लोग मिलते हैं जिन्हें हम अपने आसपास भी देख सकते हैं। Swami and Friends का स्वामी स्कूल, दोस्तों और परिवार के बीच अपनी छोटी-सी दुनिया में उलझा रहता है। The Financial Expert का मार्गय्या पैसे और अपनी सामाजिक हैसियत के चक्कर में पड़ता है। The Guide का राजू परिस्थितियों के साथ बदलता हुआ ऐसा पात्र है, जिसकी कहानी में महत्वाकांक्षा, प्रेम, छल और जीवन की विडंबनाएं एक-दूसरे से जुड़ती जाती हैं। ये पात्र किसी एक तरह के मनुष्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते। उनकी कमजोरियां भी हैं, इच्छाएं भी और अपने फैसलों के परिणाम भी।

साधारण जीवन में छिपी कहानियां खोजने की अद्भुत क्षमता

नारायण की खासियत यह थी कि वे साधारण जीवन में कहानी खोज लेते थे। उनके यहां हर घटना को असाधारण बनाने की कोशिश नहीं दिखती। कोई व्यक्ति अपनी रोजमर्रा की उलझन में कुछ ऐसा कर बैठता है कि बात हास्यास्पद हो जाती है। कभी वही स्थिति उसके जीवन की गंभीर सच्चाई भी सामने ले आती है। लेखक अपने पात्रों पर फैसला सुनाने की जल्दी नहीं करता। वह उन्हें उनकी खूबियों और कमजोरियों के साथ सामने रखता है। पाठक हंसता भी है और कई बार उस हंसी के पीछे छिपी बेचारगी को भी महसूस करता है।

उनकी भाषा में भी यही सहजता थी। वे छोटे कस्बे के जीवन को इस तरह लिखते हैं कि वहां की मामूली-सी घटना भी दिलचस्प लगने लगती है। उनके पात्र कोई बड़ी घोषणा नहीं करते, न ही हर प्रसंग किसी भारी निष्कर्ष तक पहुंचता है। फिर भी उनकी कहानियों में मनुष्य के स्वभाव, उसकी इच्छाओं और उसकी सीमाओं की पहचान मिलती है। शायद यही वजह है कि नारायण को पढ़ते हुए मालगुड़ी केवल दक्षिण भारत के किसी काल्पनिक कस्बे की तरह नहीं लगता। वहां के लोगों में हमें अपने आसपास के परिचित चेहरे भी दिखाई देने लगते हैं।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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