सागर. कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों तो मंजिल खुद रास्ता बना लेती है. सागर की बेटी रोशनी पटेल ने इस कहावत को सच साबित कर दिखाया है. कभी तालाब किनारे घूमते हुए मन में सिर्फ स्विमिंग सीखने की इच्छा जागी थी, लेकिन किस्मत ने उन्हें कयाकिंग की दुनिया से परिचित कराया. आज वही रोशनी राष्ट्रीय स्तर पर मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर रही हैं और अपनी मेहनत, साहस तथा लगन से जिले का नाम रोशन कर रही हैं.
डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विद्यालय की छात्रा रोशनी पटेल ने हाल ही में विशाखापट्टनम में आयोजित राष्ट्रीय कयाकिंग प्रतियोगिता में मध्य प्रदेश की टीम का प्रतिनिधित्व करते हुए शानदार प्रदर्शन किया. उनकी सफलता केवल एक खिलाड़ी की उपलब्धि नहीं, बल्कि उन तमाम बेटियों के लिए प्रेरणा है जो सामाजिक सोच और पारिवारिक दबाव के बीच अपने सपनों को पूरा करने का साहस जुटाती हैं.
बचपन से घूमना पसंद था तालाब
रोशनी बताती हैं कि उन्हें बचपन से ही तालाब किनारे घूमना पसंद था. एक दिन मन में विचार आया कि क्यों न तैराकी सीखी जाए. इसी सोच के साथ उन्होंने स्विमिंग की ट्रेनिंग शुरू की. प्रशिक्षण के दौरान उनकी नजर कयाकिंग खेल पर पड़ी. इस खेल की रोमांचक दुनिया ने उन्हें इतना आकर्षित किया कि उन्होंने तय कर लिया कि अब भविष्य इसी खेल में बनाना है.
रिश्तेदारों पर परिवार के फैसले पर उठाए थे सवाल
हालांकि, यह फैसला आसान नहीं था. जैसे ही रिश्तेदारों और परिचितों को पता चला कि रोशनी कयाकिंग जैसे साहसिक खेल में हिस्सा ले रही हैं, उन्होंने परिवार पर सवाल उठाने शुरू कर दिए. कई लोगों ने उनके पिता को समझाया कि बेटी को ऐसे खेलों में भेजना ठीक नहीं है. कुछ ने ताने दिए कि लड़कियों को घर की चारदीवारी तक ही सीमित रहना चाहिए. लेकिन रोशनी के पिता ने समाज की बातों की परवाह किए बिना अपनी बेटी के सपनों को प्राथमिकता दी और हर कदम पर उसका साथ दिया.
रोशनी का कहना है कि यदि परिवार का विश्वास और सहयोग नहीं मिलता तो शायद वह आज इस मुकाम तक नहीं पहुंच पातीं. उनके पिता ने न केवल उन्हें अभ्यास के लिए प्रोत्साहित किया, बल्कि हर मुश्किल समय में उनका मनोबल भी बढ़ाया. यही विश्वास उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया.
सुबह-सुबह करतीं अभ्यास
राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का सफर भी संघर्षों से भरा रहा. रोशनी रोज सुबह चार बजे उठकर अभ्यास के लिए जाती थीं. कई घंटे पानी में मेहनत करने के बाद घर लौटतीं, घरेलू कामों में परिवार का हाथ बंटातीं और फिर पढ़ाई के लिए विद्यालय जातीं. खेल और शिक्षा के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने कभी इसे बोझ नहीं माना.




