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बीकाजी के शिवरतन अग्रवाल का निधन; सिर्फ 8वीं तक पढ़े, बनाया 19 हजार करोड़ का साम्राज्य

राजस्थान के बीकानेर की तंग गलियों से निकलकर दुनिया के 50 से ज्यादा देशों तक भुजिया का स्वाद पहुंचाने वाले शिवरतन अग्रवाल अब इस दुनिया में नहीं रहे. 23 अप्रैल की सुबह चेन्नई में उनके निधन के साथ बीकाजी भुजिया के एक ऐसे अध्याय का अंत हो गया, जिसने परंपरा को आधुनिकता से जोड़कर कारोबार की नई परिभाषा गढ़ी.

यह सिर्फ एक सफल कारोबारी की कहानी नहीं, बल्कि उस जिद, जोखिम और दूरदृष्टि की कहानी है जिसने बीकानेर की भुजिया को वैश्विक पहचान दिलाई. बीकानेर में ‘फन्ना बाबू’ के नाम से पहचाने जाने वाले शिवरतन अग्रवाल की पढ़ाई भले ही महज आठवीं कक्षा तक सीमित रही, मगर उनके भीतर का व्यावसायिक नजरिया किसी बड़े मैनेजमेंट विशेषज्ञ से कम नहीं था.

उनका परिवार पहले से ही भुजिया कारोबार से जुड़ा हुआ था. शिवरतन के दादा हल्दीराम के दौर से शुरू हुई यह परंपरा बीकानेर और आसपास के इलाकों में काफी लोकप्रिय हो चुकी थी.

मगर उस समय तक भुजिया बनाने का तरीका पूरी तरह पारंपरिक था. कोयले और डीजल की भट्ठियों पर बनने वाली भुजिया या तो बोरियों में भरकर भेजी जाती थी या फिर कागज के कार्टन में. इससे इसके जल्दी खराब होने की आशंका भी बनी रहती थी और बड़े स्तर पर विस्तार की सीमाएं भी थीं.

मशीनों से भुजिया बनाने की शुरुआत

भुजिया बनाने के परंपरागत तरीके को बदलने की सोच ने शिवरतन अग्रवाल को परिवार के बाकी लोगों से अलग ला खड़ा किया. 1980 के दशक में उन्होंने यह सोच लिया था कि भुजिया अब कोयले की भट्ठियों पर नहीं, बल्कि बिजली से चलने वाली अत्याधुनिक मशीनों के जरिए बनेगी. यह कल्पना उन्होंने भुजिया की गुणवत्ता, उत्पादन और हाइजीन तीनों को बेहतर बनाने के लिए की थी. उस दौर में यह विचार लगभग असंभव माना जाता था. जब वे इस सोच को लेकर बैंकों के पास लोन लेने पहुंचे तो उनका मजाक उड़ाया गया. लोगों को यह भरोसा ही नहीं था कि भुजिया जैसी पारंपरिक चीज मशीनों से बन सकती है.

शिवरतन अग्रवाल ने हार नहीं मानी. उन्होंने करीब एक साल तक देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर मशीनों की तलाश की. तमाम अस्वीकृतियों और तानों के बावजूद उन्होंने अपने विचार पर विश्वास बनाए रखा. आखिरकार 1987 में उन्होंने भुजिया बनाने की मशीनें स्थापित कर दीं और यहीं से बीकानेर के पारंपरिक कारोबार में एक नई तकनीकी क्रांति की शुरुआत हुई. यह कदम सिर्फ उनके व्यवसाय के लिए नहीं, बल्कि पूरे स्नैक्स उद्योग के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ.

मशीनों के जरिए उत्पादन शुरू करने के बाद शिवरतन अग्रवाल एक ऐसे ब्रांड की तलाश में थे, जो बीकानेर की पहचान को अपने साथ लेकर चले. वे चाहते थे कि नाम में इस शहर का इतिहास, परंपरा और आत्मा भी झलके. कुछ सालों की तलाश के बाद 1993 में ‘बीकाजी’ नाम सामने आया. यह नाम बीकानेर के संस्थापक राव बीका के नाम पर रखा गया. यही नाम आगे चलकर एक बड़े ब्रांड में तब्दील हो गया.

बीकाजी का कारोबार फैला दुनिया में

शिवरतन अग्रवाल ने बीकाजी को सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने इसे देश और दुनिया के बाजारों तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया. धीरे-धीरे बीकाजी के प्रोडक्ट्स देश के अलग-अलग राज्यों में पहुंचने लगे और फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी जगह बनाने लगे. संयुक्त अरब अमीरात से शुरू हुआ निर्यात ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, जापान, यूरोप और कई अन्य देशों तक फैल गया. आज बीकाजी के प्रोडक्ट 50 से ज्यादा देशों में उपलब्ध हैं. शिवदीप फूड प्रोडक्ट प्राइवेट लिमिटेड और बीकाजी फूड प्रोडक्ट प्राइवेट लिमिटेड के नाम से उनके प्रोडक्ट आज दुनिया के बाजारों में छाए हैं. तीन साल पहले कंपनी का खुद का आईपीओ (IPO) लॉन्च करने का विचार भी शिवरतन अग्रवाल का ही था.

बीकानेर में स्थापित फैक्ट्रियों में आज भुजिया सहित 80 से ज्यादा फूड आइटम तैयार किए जाते हैं. उत्पादन से लेकर पैकेजिंग तक का पूरा काम आधुनिक मशीनों के जरिए होता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर के हाइजीन मानकों का ध्यान रखा जाता है. इन फैक्ट्रियों में रोजाना 60-70 टन भुजिया का उत्पादन होता है और करीब 4 हजार लोग यहां काम करते हैं. इसके अलावा हजारों परिवार इस कारोबार से अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं. बीकाजी के प्रोडक्ट आज देशभर में लाखों दुकानों पर उपलब्ध हैं और भारतीय स्नैक्स मार्केट में कंपनी की मजबूत हिस्सेदारी है.

शिवरतन अग्रवाल का योगदान सिर्फ एक सफल ब्रांड खड़ा करने तक सीमित नहीं है. उन्होंने बीकानेर के पारंपरिक कारीगरों की सोच को भी बदला. जो लोग पहले घरों या छोटी भट्टियों पर काम करते थे, उन्हें उन्होंने फैक्ट्रियों तक लाकर मशीनों के साथ काम करना सिखाया. यह बदलाव आसान नहीं था, मगर उनकी दृढ़ता और भरोसे ने इसे संभव बना दिया. उन्होंने यह साबित किया कि परंपरा और तकनीक एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं

आज जब बीकाजी का नाम देश-विदेश में लिया जाता है, तो उसके पीछे शिवरतन अग्रवाल की वही दूरदर्शिता और जोखिम उठाने की क्षमता नजर आती है. उन्होंने जिस सोच के साथ इस सफर की शुरुआत की थी, वह आज एक बड़े औद्योगिक रूप में हमारे सामने है.

बीकानेरी भुजिया की कहानी

शिवरतन अग्रवाल की तरह ही बीकानेरी भुजिया की कहानी भी कम रोचक नहीं है. भुजिया बनाने का सफर इस परिवार ने आजादी से 10 साल पहले शुरू कर दिया था. बीकानेर शहर में स्टेशन रोड पर ‘हल्दीराम भुजियावाला’ के नाम से एक छोटी सी दुकान हुआ करती थी. दुकान के मालिक थे गंगा बिशन उर्फ हल्दीराम अग्रवाल. गंगा बिशन का रंग उनके परिवार में सबसे अलग था. हल्दी जैसा गोरा रंग होने के कारण उनकी मां और अन्य लोग उन्हें ‘हल्दीराम’ कहकर पुकारते थे. बाद में यही हल्दीराम नाम उनकी पहचान बना. उस वक्त तक बीकानेर में जो भुजिया बनती थी वह मोटी और लंबी होती थी, लेकिन हल्दीराम ने पहली बार अपनी दुकान पर बेसन और मोठ से बनी पतली भुजिया बेचना शुरू किया.

‘भुजिया बैरंस’ किताब के लेखक पवित्र कुमार के अनुसार: “गंगा बिशन की चाची ने पहली बार यह अलग तरह की भुजिया बनाना शुरू किया था, जिसे गंगा बिशन अपनी दुकान पर बेचते थे.” यह भुजिया लोगों को इतनी पसंद आई कि जल्द ही उसके जायके की महक बीकानेर ही नहीं, बल्कि दूर-दूर तक फैलने लगी.

955 में यह जायका कोलकाता पहुंचा और इसके बाद देश के 30 राज्यों और 50 देशों तक फैल गया. इसी जायके से निकले बीकाजी, हल्दीराम और बीकानेरवाला का सालाना कारोबार 10 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा है. अकेले बीकाजी हर साल 30-40 हजार टन भुजिया का उत्पादन करती है.

कोयले की भट्टियों से शुरू होकर हाईटेक फैक्ट्रियों में नमकीन बनने की यह कहानी बहुत दिलचस्प है. आजादी के बाद हल्दीराम की बीकानेरी भुजिया की दुकान बीकानेर और आसपास के इलाकों में खासी लोकप्रिय हो चुकी थी. उसी दौरान वर्ष 1950 में हल्दीराम अपने एक खास मित्र भंवरलाल रामपुरिया के बेटे की शादी में कोलकाता गए. शादी का बहुत ही भव्य आयोजन था. कोलकाता के हलवाई तरह-तरह के पकवान मेहमानों के लिए तैयार कर रहे थे. इसी दौरान मौका पाकर हल्दीराम ने भी मेहमानों के लिए भुजिया बनाई.

मेहमानों को भुजिया इतनी पसंद आई कि उन्होंने बीकानेर से भुजिया मंगवाने के बड़े-बड़े ऑर्डर दे डाले. शादी का जश्न थमा तो भंवरलाल ने हल्दीराम से कहा: “कोलकाता चटोरों का शहर है, बंगालियों का जायका बहुत अच्छा है. इसलिए बीकानेर के अलावा कोलकाता में भी भुजिया के कारोबार की बहुत संभावनाएं हैं.”

हल्दीराम को भंवरलाल का यह विचार पसंद आया. बीकानेर लौटकर उन्होंने परिवार को इस बारे में बताया तो पहले तो कोई भी कोलकाता जाने के लिए सहमत नहीं हुआ. हल्दीराम को अपने परिवार को मनाने में पांच साल लगे.

1955 में वे अपने सबसे बड़े बेटे शिवकिशन अग्रवाल और रामेश्वरलाल के साथ रेगिस्तान को पार कर समुद्र की तरफ निकल पड़े. हल्दीराम जब कोलकाता चले गए तो हल्दीराम भुजिया का कारोबार उनके सबसे छोटे बेटे मूलचंद अग्रवाल ने संभाला. करीब ढाई दशक तक मूलचंद अग्रवाल अपने चार बेटों- शिवकिशन, मनोहर, मधु और शिवरतन के साथ हल्दीराम भुजिया का कारोबार चलाते रहे.

1970 में मूलचंद के बड़े बेटों शिवकिशन, मनोहरलाल और मधु ने मिलकर भुजिया का एक नया ब्रांड शुरू किया और नाम रखा अपने दादाजी के नाम पर-  हल्दीराम. शिवकिशन, मनोहर और मधु ने अपना कारोबार बढ़ाने के लिए नागपुर और राजधानी दिल्ली का रुख किया. वहीं चौथे बेटे शिवरतन अग्रवाल ने तीनों भाइयों के साथ मिलकर कारोबार करने के बजाय ‘बीकाजी’ नाम से एक नए ब्रांड की शुरुआत की.

Manoj Mishra

Editor in Chief

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