पश्चिम चंपारण: अब सब्जियों की खेती के लिए बड़े खेतों की जरूरत नहीं रह गई है. अगर आपसे कहा जाए कि जमीन के एक छोटे से टुकड़े पर ही कई तरह की सब्जियां उगाकर अच्छी आमदनी की जा सकती है, तो शायद यह सुनकर आश्चर्य हो. लेकिन पश्चिम चंपारण जिले में कृषि वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक को बढ़ावा दिया है, जो इस धारणा को पूरी तरह बदल रही है. इस तकनीक का नाम है ‘मल्टीलेयर फार्मिंग’, जिसमें सीमित जमीन पर एक साथ कई फसलों की खेती संभव है. खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित हो रही है.
छोटे किसानों के लिए वरदान बनी तकनीक
पश्चिम चंपारण जिले के माधोपुर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में कार्यरत वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह के अनुसार, मल्टीलेयर फार्मिंग में फसलों का चयन उनकी ऊंचाई के आधार पर किया जाता है. इस पद्धति में जमीन की हर परत का बेहतर उपयोग किया जाता है, जिससे कम जगह में अधिक उत्पादन लिया जा सकता है.
परत दर परत उगती हैं फसलें
इस तकनीक में सबसे नीचे जमीन की सतह पर अदरक, हल्दी, गाजर और मूली जैसी फसलें लगाई जाती हैं. इसके ऊपर मध्यम स्तर पर टमाटर, बैंगन और मिर्च की खेती की जाती है. वहीं ऊपरी स्तर पर लौकी, कद्दू और खीरा जैसी सब्जियां उगाई जाती हैं. सबसे ऊपर मचान बनाकर करेला, सेम और नेनुआ जैसी बेल वाली फसलें लगाई जाती हैं. इस तरह एक ही जगह पर कई प्रकार की सब्जियां तैयार होती हैं.
आमदनी में कई गुना इजाफा
डॉ. अभिषेक के मुताबिक, पारंपरिक खेती की तुलना में मल्टीलेयर फार्मिंग से किसानों की आमदनी में कई गुना वृद्धि होती है. जहां एक बीघा जमीन में केवल टमाटर की खेती से करीब 50 हजार रुपये की कमाई होती है, वहीं इस तकनीक से 1.5 से 2 लाख रुपये तक की आय संभव है. इसके अलावा, एक ही खाद, पानी और श्रम में कई फसलें तैयार होने से लागत भी काफी कम हो जाती है.
सालभर मिलता है रोजगार और सुरक्षा
मल्टीलेयर फार्मिंग की एक बड़ी खासियत यह भी है कि इसमें फसल खराब होने का जोखिम कम रहता है. यदि किसी एक फसल को नुकसान होता है, तो अन्य फसलें किसानों को आर्थिक सहारा देती हैं. साथ ही अलग-अलग मौसम में विभिन्न फसलों के उत्पादन से किसानों को सालभर काम और आय मिलती रहती है. कुल मिलाकर, मल्टीलेयर फार्मिंग पश्चिम चंपारण के किसानों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरी है, जो कम जमीन में ज्यादा उत्पादन और बेहतर आमदनी का रास्ता दिखा रही है.





