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ना सहारा, ना हार! बिना हाथ आत्मनिर्भरता की कहानी लिख रहे बालाघाट के महेश, अनोखी है कहानी

ज़मीर ज़िंदा रख, कबीर ज़िंदा रख,
बन जाए सुल्तान तो भी दिल में फकीर ज़िंदा रख,
हार जा चाहे ज़िंदगी में सब कुछ मगर,
जीतने की उम्मीद और अपनी खुद्दारी ज़िंदा रख.”

यह पंक्तियां सटीक बैठती है महेश कटरे पर, जिनके दोनों हाथ न होते हुए भी किसी पर आश्रित नहीं है. वह खुद बकरियां चराते हैं और अपना और परिवार का पालन पोषण करती है. वह वारासिवनी विकासखंड के नांदगांव में रहते हैं और बीते 12 साल से वह बकरियां चरा रहे है. लेकिन 12 साल पहले ऐसा क्या हुआ कि उनकी जिंदगी बदल गई. ऐसे में लोकल 18 उनसे मुलाकात की और जानी उनकी पूरी कहानी…

नई उम्र और खुद के पैरौं पर खड़े होने की जिद
नांदगांव के रहने वाले महेश कटरे अब से 12 साल पहले नए-नए बालिग हुए थे. वह बालाघाट से बाहर हैदराबाद मजदूरी के लिए गए थे. वह चाहते थे कि बड़े शहर जाए कुछ पैसे कमाएं और परिवार के जीवन यापन में छोटा सा योगदान दे. लेकिन जिंदगी को ये नामंजूर था. उनकी जिंदगी तब बड़ा बदलाव आया जब वह 11 केवी विद्युत लाइन की चपेट में आ गए. इसके बाद उनके दोनों हाथ गंभीर रूप से झुलस गए. हाथ इतने झुलस गए थे कि उनके दोनों हाथ काटने पड़ गए. इसके बाद महेश पूरी तरह टूट गए. और अपने गांव लौट गए.

एक समय आया और फिर उठ खड़े होने की ठानी
महेश जब हैदराबाद से लौटे तब वह 6 महीने तक इलाज ले रहे थे. ऐसे में उनके पास काम करने का कोई विकल्प नहीं था. लेकिन उनकी इच्छा शक्ति कुछ और ही थी. ऐसे में उन्होंने कुछ करने की ठानी और पहुंच गए कलेक्टर कार्यालय. वहां पर उन्होंने तत्कालीन कलेक्टर साहब से कहां कि सर मुझे काम करना है. मुझे रोजगार चाहिए. इसके बाद कलेक्टर ने उनसे पुछा तुम क्या कर सकते हो. तब उन्होंने बताया कि मैं बकरी पालन करना चाहता हूं. इसके बाद उन्हें बकरी खरीदने के लिए लोन मिला और उन्होंने बकरी चराना शुरू किया.

गांव के लोग भी करते है जज्बे की तारीफ
महेश बीते 12 साल से ही बकरी पालन का काम कर रहे है. वह जमनापारी, तोतापरी और देसी नस्ल की बकरियां पालते हैं. ऐसे में अब उनकी तारीफ गांव के लोग करते हैं. उनके जज्बे को सलाम करते हैं. वहीं, जो भी उन्हें देखता है, तो उन्हें देख हैरान हो जाता है.अब नाराज है महेश
महेश का कहना है कि बीते कुछ दिन पहले उनकी दो बकरियों को तेंदुए ने निवाला बना लिया. इसके एवज में वन विभाग से मुआवजा भी मिला. लेकिन वह इतना नहीं है कि उनकी वास्तविक बाजार कीमत की भरपाई कर सके. यह कहते हुए महेश की आंखें नम हो जाती है. ऐसे में वह चाहते हैं कि बकरियों या पशुओं की मौत पर मुआवजा राशि पशुपालक के साथ न्याय करने लायक हो.

Manoj Mishra

Editor in Chief

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