जिंदगी अक्सर इंसान की राह को कठिन बना देती है. कई लोग इन कठिनाइयों की सिर्फ शिकायत करते रहते हैं. लेकिन, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो कठिन परिस्थितियों को आसानी से जीत लेते हैं. ऐसे ही एक शख्स हैं प्रमोद विश्वकर्मा. वे अपनी तकलीफों को मात देकर समाज के लिए मिसाल पेश कर रहे हैं. प्रमोद वर्तमान में बालाघाट के कटंगी एसडीएम (SDM) ऑफिस में पदस्थ हैं. वे दुनिया को जिंदगी जीने की कला सिखा रहे हैं.
बचपन में ही चली गई थी आंखों की रोशनी
प्रमोद मूल रूप से जबलपुर के रहने वाले हैं. वे देख नहीं सकते, लेकिन ऐसा हमेशा से नहीं था. चार साल की उम्र तक वे सब कुछ देख सकते थे. अचानक उनकी आंखों की रोशनी चली गई. परिजनों ने उन्हें कई डॉक्टरों को दिखाया. डॉक्टरों ने बताया कि ऑपरेशन करने पर जान का जोखिम बढ़ सकता है. इसके बाद उनके दोबारा देखने की उम्मीद खत्म हो गई और आंखों में रोशनी का सपना अधूरा रह गया.
ब्रेल लिपि से की 12वीं तक की पढ़ाई
प्रमोद ने अपनी शुरुआती पढ़ाई जबलपुर के एक नेत्रहीन स्कूल से की. वे पढ़ाई में काफी अच्छे थे. उन्होंने ब्रेल लिपि के जरिए शिक्षा प्राप्त की. 12वीं के बाद उन्हें आगे पढ़ने का मौका नहीं मिला और पढ़ाई छोड़नी पड़ी. साल 2015 में उन्हें सरकारी नौकरी मिली. तब से वे कटंगी एसडीएम कार्यालय में भृत्य (प्यून) के पद पर कार्यरत हैं.
बिना देखे ढूंढ लेते हैं अफसरों का चेंबर
प्रमोद की आंखें भले ही देख नहीं सकतीं, लेकिन वे ऑफिस के चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं. अफसर उन्हें जिस भी चेंबर में फाइल ले जाने के लिए कहते हैं, वे आसानी से वहां चले जाते हैं. उन्हें काम करते देख हर कोई हैरान रह जाता है. प्रमोद पिछले 10 सालों से इसी ऑफिस में काम कर रहे हैं. अब उन्हें किसी भी काम में कोई समस्या नहीं होती है.
परिवार का साथ और सकारात्मक सोच
प्रमोद की पत्नी भी दिव्यांग हैं, लेकिन वे भी काम करती हैं. प्रमोद को ऑफिस लाने और ले जाने का काम उनके बच्चे करते हैं. प्रमोद अपनी समस्या की कभी शिकायत नहीं करते. वे हमेशा खुश रहते हैं और पूरी मेहनत से अपना काम करते हैं. उनकी कहानी हमें सिखाती है कि अगर हौसला हो, तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती.





