छत्तीसगढ़

जंगल और परंपराओं से बेंगलुरु तक पहुंचा बैगा हुनर, श्रीबाई बैगा ने बनाई नई पहचान

*जंगल और परंपराओं से बेंगलुरु तक पहुंचा बैगा हुनर, श्रीबाई बैगा ने बनाई नई पहचान*

*पहली रेल यात्रा में राष्ट्रीय मंच तक पहुंचीं बैगा महिला उद्यमी, अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की प्रदर्शनी में पारंपरिक आभूषणों का कर रहीं प्रदर्शन*

*बिरन के माध्यम से पारंपरिक हस्तशिल्प को मिल रहा आजीविका का आधार, महिला उद्यमिता और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा*

कवर्धा, अक्टूबर 2026। छत्तीसगढ़ के वनांचल में संजोई गई बैगा समुदाय की पारंपरिक कला अब बेंगलुरु तक अपनी पहचान बना रही है। कबीरधाम जिले की बैगा महिला उद्यमी श्रीबाई बैगा अपने हाथों से तैयार पारंपरिक आभूषणों को अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में आयोजित प्रदर्शनी के माध्यम से व्यापक मंच पर प्रस्तुत कर रही हैं। कभी स्थानीय परंपराओं और समुदाय की सांस्कृतिक पहचान तक सीमित रहने वाला उनका हुनर अब नए लोगों तक पहुंच रहा है। खास बात यह है कि बेंगलुरु तक का यह सफर उनकी पहली रेल यात्रा भी है। मेहनत, आत्मविश्वास और अपनी कला के प्रति लगन के साथ आगे बढ़ रहीं श्रीबाई बैगा की यह यात्रा आदिवासी महिलाओं के हुनर को आजीविका और उद्यमिता से जोड़ने की प्रेरक कहानी है।

पारंपरिक आभूषणों में झलकती है बैगा संस्कृति

बैगा समुदाय भारत के विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) में शामिल है। इस समुदाय की अपनी विशिष्ट परंपराएं, सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक ज्ञान है। श्रीबाई बैगा इसी विरासत को अपने हस्तनिर्मित आभूषणों के माध्यम से सहेजने और आगे बढ़ाने का काम कर रही हैं। उनके हाथों से तैयार आभूषणों में बैगा समुदाय की परंपराओं और स्थानीय शिल्पकला की झलक दिखाई देती है। बिरन के माध्यम से वे अपने पारंपरिक हुनर को आजीविका से जोड़ रही हैं। बेंगलुरु की प्रदर्शनी में सहभागिता से उन्हें अपने उत्पादों को नए लोगों के सामने प्रस्तुत करने, उनकी पहचान बढ़ाने और संभावित बाजारों से जुड़ने का अवसर मिल रहा है।

पहली रेल यात्रा, नई संभावनाओं की ओर कदम

श्रीबाई बैगा के लिए यह यात्रा केवल एक शहर से दूसरे शहर तक पहुंचने का सफर नहीं है, बल्कि अपने हुनर को व्यापक पहचान दिलाने की दिशा में बढ़ाया गया महत्वपूर्ण कदम है। पहली बार रेल यात्रा कर बेंगलुरु पहुंचना उनके लिए एक नया अनुभव है। यहां अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित प्रदर्शनी में वे अपने हाथों से तैयार पारंपरिक आभूषणों का प्रदर्शन कर रही हैं। इस प्रदर्शनी के जरिए उनके उत्पादों को नए बाजारों तक पहुंचाने और बैगा समुदाय की पारंपरिक शिल्पकला को पहचान दिलाने का अवसर मिल रहा है।

पारंपरिक कला से आत्मनिर्भरता की राह

बिरन पारंपरिक ज्ञान, आदिवासी हस्तशिल्प और स्थानीय कौशल को आजीविका एवं उद्यमिता के अवसरों से जोड़ने की पहल है। इसके माध्यम से पारंपरिक शिल्प से जुड़ी महिलाओं को अपने उत्पादों के प्रदर्शन और बाजार तक पहुंच बनाने का अवसर मिल रहा है। उनकी सहभागिता न केवल बैगा समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को सामने लाती है, बल्कि अन्य आदिवासी महिलाओं को भी अपने कौशल के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने और उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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