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63 साल पुराना वो गाना, जिसमें कबीर की पंक्ति को बॉलीवुड ने अपनाया, मन्ना डे की आवाज और पद्मिनी प्रियदर्शिनी के क्लासिकल डांस ने बनाया एवरग्रीन

1963 में आई फिल्म ‘दिल ही तो है’ का गाना ‘लागा चुनरी में दाग, छुपाऊं कैसे’ आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार शास्त्रीय गीतों में गिना जाता है. मन्ना डे की आवाज में सजे इस गीत को संगीतकार रोशन ने राग भैरवी के रंग में ढाला था, जबकि इसके बोल साहिर लुधियानवी ने लिखे थे. पर्दे पर राज कपूर और क्लासिकल डांसर पद्मिनी प्रियदर्शिनी की मौजूदगी ने गाने को अलग पहचान दी. दिलचस्प बात यह है कि गाने के शब्द सिर्फ प्रेम या विरह की कहानी नहीं कहते, बल्कि आत्मा और सांसारिक जीवन के रूपक के जरिए गहरी आध्यात्मिक बात रखते हैं. यही वजह है कि 63 साल बाद भी इसकी चमक बरकरार है.

कबीर के दर्शन से निकला ‘चुनरी में दाग’ का रूपक

‘लागा चुनरी में दाग’ के पीछे संत कबीर की निर्गुण भक्ति परंपरा की छाप मानी जाती है. गाने में ‘चुनरी’ को प्रतीक के तौर पर देखा गया है, जबकि ‘दाग’ सांसारिक मोह, गलतियों और मन की मैल की तरफ इशारा करता है. साहिर लुधियानवी ने इसी आध्यात्मिक भाव को फिल्मी गीत की भाषा में ढाला. गाने की पंक्ति ‘घर जाऊं कैसे’ भी केवल मायके लौटने की चिंता नहीं, बल्कि अपने मूल या परम घर की ओर लौटने के भाव से जोड़ी जाती है. इस तरह एक साधारण-सी लगने वाली दुल्हन की कहानी धीरे-धीरे आत्मचिंतन का रूप ले लेती है.

मन्ना डे की आवाज और पद्मिनी प्रियदर्शिनी का क्लासिकल जादू

इस गीत की सबसे बड़ी ताकत मन्ना डे की शास्त्रीय पकड़ थी. राग भैरवी पर आधारित इस रचना में उनकी तान, हरकत और सुरों की बारीकी साफ सुनाई देती है.  पर्दे पर इस आवाज का साथ राज कपूर और क्लासिकल डांसर पद्मिनी प्रियदर्शिनी ने दिया. गाने की प्रस्तुति में शास्त्रीय नृत्य और राज कपूर की अदाकारी का ऐसा मेल दिखाई देता है, जो इसे बाकी फिल्मी गीतों से अलग बनाता है. फिल्म में राज कपूर के साथ नूतन, प्राण, आगा, नाजिर  हुसैन और लीला चिटनिस जैसे कलाकार भी थे. फिल्म का निर्देशन सी.एल. रावल और पी.एल. संतोषी ने किया था और निर्माता बी.एल. रावल थे.

गाना अमर हुआ, लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली

‘दिल ही तो है’ का संगीत फिल्म की सबसे मजबूत यादों में शामिल रहा. इसके एल्बम में मन्ना डे के अलावा आशा भोसले, मुकेश, लता मंगेशकर और सुमन कल्याणपुर जैसे गायकों की आवाजें भी थीं. ‘निगाहें मिलाने को जी चाहता है’, ‘तुम अगर मुझको न चाहो तो’ और ‘तुम्हारी मस्त नजर’ जैसे गीत भी इसी फिल्म का हिस्सा थे. दिलचस्प ट्रिविया यह है कि उपलब्ध पुराने बॉक्स ऑफिस आंकड़ों के अनुसार फिल्म ने करीब 42 लाख रुपये नेट और 84 लाख रुपये ग्रॉस कमाए थे और 1963 की फिल्मों में 18वें स्थान पर रही थी. इसी स्रोत ने फिल्म को ‘औसत से कम’ बताया है. यानी जिस फिल्म की व्यावसायिक कामयाबी सीमित रही, उसका एक गीत आने वाली पीढ़ियों के लिए क्लासिक बन गया

Manoj Mishra

Editor in Chief

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