देश दुनिया

संघर्ष ही सफलता की असली कहानी: मंजिल नहीं, सफर को समझने की जरूरत | दुनिया मेरे आगे

जीवन एक ऐसा संग्राम है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपने हिस्से का संघर्ष करना पड़ता है। किसी के संघर्ष बाहरी दुनिया में होते हैं और किसी के अपनी भीतरी दुनिया में। दूसरे के दर्द और संघर्ष हमें दिखाई नहीं देते। हम उनके केवल परिणाम ही देख सकते हैं। इसीलिए अपना संघर्ष कभी न खत्म होने वाली नाउम्मीदी जैसा लगता है, लेकिन दूसरे का नहीं। कोई भी परिणाम एक लंबी यात्रा और द्वंद्व का आखिरी पड़ाव होता है। वह एकदम घटित नहीं होता। उसके पीछे कठिन मेहनत, इच्छाशक्ति और कुछ करने की दृढ़ता छिपी रहती है।जब हम सफलताओं के पीछे के वास्तविक संघर्ष से वाकिफ नहीं होते, तब सफलताएं किसी लंबी यात्रा का आखिरी सिरा नहीं लगकर चमत्कार सरीखी लगती हैं। आजकल के उपभोक्तावादी युग में, जब परिणामों को विज्ञापनों के माध्यम से भुनाना होता है, तो उन्हें उनके संदर्भों से काटकर प्रस्तुत किया जाता है। इससे वे वास्तविकता से अलग होकर थोड़े-से समय में हासिल की गई उपलब्धि लगने लगते हैं। वे रोमांचित करते हैं और थोड़ी-सी कोशिश से ही कुछ भी संभव कर लेने का भ्रम पैदा करते हैं।

जीवन में मेहनत के बिना कहीं कोई परिणाम नहीं होते। यहां चमत्कार एक लंबी प्रक्रिया में आकार लेते हैं। अपने सोचे हुए को हासिल कर लेना, उसे घटित होते हुए देखना ही दुनिया में सबसे बड़ा चमत्कार है। ऐसे चमत्कारों तक पहुंचने में लंबा वक्त, अथक मेहनत और संघर्ष लगता है। इन चमत्कारों को घटित करने के लिए जरूरी है कि मनुष्य कोशिश करता रहे। उसे कोशिश कभी नहीं छोड़नी चाहिए। उस वक्त भी नहीं, जब उसे लगे कि अब झुक जाना चाहिए, क्योंकि झुककर भी उसे कुछ हाथ नहीं आता। जीवन के अंत तक अफसोस रखने से अच्छा है कि हम अंत तक प्रयास करें। प्रयास करते रहने से मनुष्य अपने सोचे हुए से भी अधिक परिणाम प्राप्त कर सकता है, शर्त बस यही है कि वह कोशिशों के बीच अपने अहं को न लाए।

इतिहास के कई उदाहरणों में हम देखते हैं कि कोशिशें करते रहने से व्यक्ति अपनी अपेक्षाओं को ही नहीं, इंसानी सीमाओं को भी पार करने में सफल हुआ है। दरअसल, मनुष्य की क्षमताओं की सीमा तो है, लेकिन अंत नहीं। ये सीमाएं विस्तृत होती रहती हैं और इन्हें मनुष्य स्वयं अपने लिए विस्तृत करता है। चीजों और स्थितियों से गुजरकर ही मनुष्य न केवल उनका सत्य, बल्कि स्वयं का सत्य भी पहचानने की क्षमता अर्जित कर लेता है। किसी भी कार्य का परिणाम वही नहीं होता, जो सबको दिखता है। वास्तविक परिणाम वह बदलाव और सोच होती है, जो किसी कार्य को करने के दौरान विकसित होती है।

जीवन में कुछ भी पीछे नहीं जाता। मनुष्य के लिए लौटने का कोई रास्ता नहीं है। जहां हम हैं, उससे आगे का सोचने में ही फायदा है। जीवन में जीत कोई ऐसी स्थिर स्थिति नहीं है, जिसे एक बार हासिल करके छोड़ दिया जाए। इतिहास में हम देखते हैं कि पहली बार जीतने वाले लोग अंत तक नायक नहीं रह जाते। इतिहास हमें सिखाता है कि एक बार की जीत काफी नहीं, जीवन में कोशिश रोज करनी पड़ती है। जो हमने हासिल कर लिया है, अगर उसे बनाए रखने के लिए मेहनत नहीं करेंगे, तो वह बचा नहीं रहेगा।

जिस तरह पराजय स्थायी नहीं है, उसी तरह कोई विजय भी स्थायी नहीं है। स्थायित्व सतत कर्मों की उस शृंखला से बनता है, जिसके लिए रोज प्रयत्न किए जाने की जरूरत होती है। मनुष्य को किसी भी प्रवृत्ति को स्थायी नहीं मान लेना चाहिए। चीजें आती हैं और बीत जाती हैं। जो उनसे टकराने की कोशिश करता है, वही बचा रहता है, अन्यथा समय उसे किनारे कर देता है।

कोई कितना ही महान क्यों न हो जाए, हर व्यक्ति को रोज उठकर नई शुरुआत करनी ही पड़ती है। एक सीमा के बाद थोड़ा-थोड़ा जुड़कर भी बहुत कुछ होने लगता है, लेकिन इन सबके पीछे एक-एक दिन की मेहनत और लगन होती है। कोई भी व्यक्ति अपने काम से जुनून की हद तक प्रेम किए बिना अपने क्षेत्र में शिखर तक नहीं पहुंचता।

जब तक सतत किए गए परिश्रम को देखना हम नहीं सीखेंगे, सफलताएं हमें चमत्कार या छलांग मालूम होती रहेंगी। अंततः प्रयास ही होते हैं, जो व्यक्ति को कहीं भी ले जा सकते हैं। हो सकता है कार्य में सफलता न मिले, लेकिन बिना प्रयास के तो सभी दरवाजे बंद ही होते हैं। प्रयास ही रास्तों को, दिशाओं को और हमारे दिमाग को खोलते हैं।

अक्सर ऐसा होता है कि मनुष्य परिणाम के बारे में प्रयासों की बजाय ज्यादा सोचता है। इससे दूसरों के साथ अपनी अपेक्षाओं का बोझ भी उस पर बढ़ता है। परिणाम पर दृष्टि केंद्रित करने की वजह से व्यक्ति अपनी गलतियों को नजरअंदाज कर देता है। जब हम प्रक्रिया को जीने के बजाय केवल रास्ते की तरह देखते हैं, तब लक्ष्य हासिल कर लेने पर भी हम उसके साथ सहज नहीं हो पाते।

जीवन में कोई भी चीज लक्ष्य है ही नहीं, बस यात्रा है और इसी को जीना सीखना है। लक्ष्य एक छोटे-से समय में छोटा-सा बिंदु है, जो बदलता रहता है। इसलिए उसके प्रति हद से ज्यादा सतर्कता मनुष्य में विकृति पैदा करती है। कुछ न कुछ करते रहना मनुष्य का स्वभाव है। इसी सहजता के साथ मनुष्य को कोशिश करनी चाहिए। अपने ऊपर दबाव बनाकर किए गए कार्य से हुए हासिल की जीवन में क्या भूमिका होगी? किसी भी लक्ष्य से अधिक महत्त्वपूर्ण चलते रहना है। चलते रहने से हासिल भी होता ही रहेगा। कुंवर नारायण के शब्दों में – “तब तुम पाओगे कि कोई फर्क नहीं/ सब कुछ जीत लेने में/ और अंत तक हिम्मत न हारने में।” अंत तक जुटे रहने में ही जीवन के कई आयाम खुलते हैं।

Manoj Mishra

Editor in Chief

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button