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पिता होमगार्ड, बेटा बना SDM; 24 साल के विश्वजीत ने दूसरे प्रयास में हासिल की बड़ी सफलता

कहते हैं कि हौसलों के तरकश में अगर कोशिशों का तीर जिंदा हो, तो किस्मत की लकीरों को भी अपना रास्ता बदलना पड़ता है. बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) की 70वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा के नतीजों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सफलता किस्मत से नहीं, बल्कि मेहनत, संघर्ष और अटूट हौसले से हासिल होती है. ऐसी ही सफलता की एक प्रेरणादायक कहानी बिहार के बेगूसराय जिले से सामने आई है, जहां एक  अपनी कड़ी मेहनत, लगन और दृढ़ संकल्प के दम पर बीपीएससी 70वीं परीक्षा में शानदार सफलता हासिल कर सीधे एसडीएम बनने का सपना साकार कर लिया. सीमित संसाधनों और तमाम चुनौतियों के बावजूद उन्होंने साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो मंजिल खुद रास्ता बना लेती है.

अभावों को बनाया ढाल, पिता के ‘त्याग’ से मिली प्रेरणा

​यह कहानी बेगूसराय के साहेबपुर कमाल थाना क्षेत्र के खरहट गांव के रहने वाले कुमार विश्वजीत की है… विश्वजीत के पिता शंभू शरण राय बिहार पुलिस में एक होमगार्ड के जवान हैं. वहीं उनकी मां कुशल गृहिणी हैं. पिता की सीमित तनख्वाह में परिवार का गुजारा करना और बच्चों को पढ़ाना कितना मुश्किल होता है, इसे विश्वजीत ने बचपन से बहुत करीब से देखा था, ​लेकिन घर की आर्थिक तंगी कभी उनकी पढ़ाई के आड़े नहीं आई. पिता की खाकी वर्दी को देखकर विश्वजीत के मन में हमेशा समाज के लिए कुछ बड़ा करने का जज्बा पैदा होता था. उन्होंने बचपन में ही ठान लिया था कि वे प्रशासनिक सेवा में जाएंगे, ताकि सीधे जनता की समस्याओं का समाधान कर सकें और अपने पिता के सिर को समाज में गर्व से ऊंचा कर सकें.

अर्जुन की तरह लक्ष्य पर थी नजर

​मात्र 24 साल की उम्र में विश्वजीत अर्जुन की तरह अपने लक्ष्य पर नजरें गड़ाए बैठे थे. हालांकि उनकी यह राह इतनी आसान नहीं थी. ​पहला प्रयास में असफलता हाथ लगी, लेकिन हिम्मत नहीं हारी… अपनी कमियों को पहचाना, गलतियों को सुधारा और दोगुनी मेहनत से तैयारी में जुट गए. जिसका ​नतीजा यह रहा कि अपने दूसरे प्रयास में न सिर्फ परीक्षा पास की, बल्कि सीधे एसडीएम का पद हासिल कर लिया.

दूसरे प्रयास में बने SDM

एसडीएम विश्वजीत ने कहा कि असफलता से कभी डरना नहीं चाहिए. मेरा पहला प्रयास सफल नहीं रहा था, लेकिन मैंने हार मानने के बजाय अपनी कमियों को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया. पढ़ाई के दौरान पिता के त्याग और उनके संघर्ष को हमेशा अपनी आंखों के सामने रखा, जिससे कभी लक्ष्य से भटकाव नहीं हुआ.

गांव में ढोल-नगाड़े के साथ जश्न

​जैसे ही विश्वजीत के एसडीएम बनने की खबर उनके पैतृक गांव खरहट पहुंची, पूरा इलाका जश्न के माहौल में डूब गया. गांव में वक्त से पहले ही होली और दिवाली एक साथ मनाई गई. ग्रामीणों ने एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाया, ढोल-नगाड़े बजाए और जमकर मिठाइयां बांटीं. ​

गांव के बुजुर्गों और युवाओं का कहना है कि विश्वजीत ने संसाधनों की कमी का रोना रोने वाले लोगों के सामने एक मिसाल पेश की है. होमगार्ड के बेटे की यह शानदार कामयाबी आज पूरे बिहार के उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है, जो सीमित संसाधनों में बड़े सपने देखने की हिम्मत रखते हैं

Manoj Mishra

Editor in Chief

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