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ढैंचा की जड़ों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण वाले बैक्टीरिया पाए जाते हैं, हरी खाद से मिट्टी सुधरेगी, यूरिया बचेगी

मझौलिया प्रखंड के कृषि विज्ञान केंद्र, माधोपुर के प्रधान वैज्ञानिक अभिषेक प्रताप सिंह ने किसानों को ढैंचा फसल अपनाने की अपील की। इसका लक्ष्य खेतों की उर्वरता बढ़ाना बताया गया। रासायनिक उर्वरकों का उपयोग घटाने की सलाह दी गई। डॉ सिंह ने कहा कि अंधाधुंध रासायनिक उर्वरक मिट्टी की सेहत बिगाड़ रहे हैं। मिट्टी की संरचना कमजोर हो रही है व उत्पादन लागत बढ़ रही है।

डॉ सिंह ने ढैंचा को दलहनी फसल बताया। ढैंचा की जड़ों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले बैक्टीरिया पाए जाते हैं। ढैंचा को 45-50 दिन की अवस्था में खेत में जोतकर मिट्टी में मिलाने से प्रति एकड़ लगभग 25-30 किलो नाइट्रोजन की पूर्ति होती है। इससे यूरिया की 50-60 किलो तक बचत होती है। मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ता है। जल धारण क्षमता सुधरती है व कठोर भूमि भुरभुरी बनती है।

डॉ सिंह ने कहा कि धरती माता को बचाने के लिए जैविक खेती ही एकमात्र विकल्प है। ढैंचा जैसी हरी खाद फसलों को खेत में पलटने से जमीन जहरीले रसायनों से बचेगी। आने वाली पीढ़ी के लिए उपजाऊ जमीन बचेगी। कृषि विज्ञान केंद्र, माधोपुर 18 जून को प्राकृतिक खेती पर बड़ा प्रशिक्षण कार्यक्रम करेगा। 200 से अधिक किसानों के शामिल होने की संभावना जताई गई।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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