- एक ऐसा अदृश्य जहर, जो हर साल लाखों लोगों की जान ले रहा है और करोड़ों बच्चों की बुद्धि, याददाश्त व भविष्य को खतरे में डाल रहा है, उससे निपटने की दिशा में आईआईटी गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता हासिल की है।
- उन्होंने कुदरती बैक्टीरिया पर आधारित एक पर्यावरण-अनुकूल जैविक तकनीक विकसित की है, जो बैटरी रीसाइक्लिंग, खनन और धातु उद्योगों से निकलने वाले जहरीले अपशिष्ट जल से लेड (सीसा) को प्रभावी ढंग से अलग कर सकती है।
- इस तकनीक में बैक्टीरिया पानी में मौजूद सल्फेट को सल्फाइड में बदल देते हैं, जो घुले हुए लेड को ठोस ‘लेड सल्फाइड’ में बदल देता है। इसे आसानी से छानकर अलग किया जा सकता है।
- खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में हानिकारक रसायनों की जरूरत नहीं पड़ती और पारंपरिक तरीकों की तुलना में बहुत कम जहरीला स्लज बनता है।
- शोधकर्ताओं के अनुसार यह तकनीक भविष्य में औद्योगिक लेड प्रदूषण को कम करने के साथ-साथ खनन, स्मेल्टिंग और अन्य धातु उद्योगों के अपशिष्ट जल के उपचार में भी उपयोगी साबित हो सकती है।
एक ऐसा अदृश्य जहर, जो बच्चों की बुद्धि, याददाश्त और भविष्य तक को प्रभावित कर सकता है, हर दिन उद्योगों से निकलने वाले जहरीले पानी के साथ पर्यावरण में पहुंच रहा है। यह जहर है , जिससे निपटने की दिशा में के वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता हाथ लगी है।
आईआईटी गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने एक नई इको-फ्रेंडली जैविक तकनीक विकसित की है, जो उद्योगों से निकलने वाले दूषित जल से ढंग से अलग कर सकती है। खास बात यह है कि इस काम के लिए किसी हानिकारक केमिकल का नहीं, बल्कि कुदरती बैक्टीरिया का इस्तेमाल किया गया है।
यह समस्या कितनी गंभीर है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सीसे से होने वाला प्रदूषण हर साल तकरीबन रहा है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इससे दुनिया भर में प्रभावित हैं, जिनमें से 27.5 करोड़ भारतीय हैं। वहीं यूनिसेफ के मुताबिक दुनिया में हर तीन में से एक पांच माइक्रोग्राम प्रति डेसीलीटर से ज्यादा है, जोकि उनके स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।
गौरतलब है कि अब तक फैक्ट्रियों से निकलने वाले इस जहरीले पानी को साफ करने के लिए मुख्य रूप से रासायनिक तरीकों की मदद ली जाती है। इसमें दो बड़ी मुश्किलें आती हैं, पहला इसमें बहुत ज्यादा वक्त लगता है। और दूसरा सफाई के बाद भारी मात्रा में सीसा युक्त जहरीला स्लज बच जाता है, जिसे ठिकाने लगाना अपने आप में एक बड़ी सिरदर्दी है।
लेकिन इस नई जैविक तकनीक में न केवल से हटाया दिया, बल्कि साथ ही पारंपरिक तरीकों की तुलना में काफी कम मात्रा में स्लज भी बना।
कैसे काम करती है आईआईटी की यह नई ‘बायो-तकनीक’?
इन चुनौतियों से निपटने के लिए आईआईटी गुवाहाटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर प्रणब कुमार घोष और उनके रिसर्च स्कॉलर श्रीकांत यादव गोल्ला ने किसी रासायनिक प्रक्रिया की बजाय प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले ‘सल्फेट-रिड्यूसिंग बैक्टीरिया’ (बिना ऑक्सीजन के पनपने वाले जीवाणु) की मदद ली है।
ये सूक्ष्मजीव ऑक्सीजन रहित वातावरण में पनपते हैं और दूषित जल में मौजूद सल्फेट को सल्फाइड में बदल देते हैं। इसके बाद यही सल्फाइड पानी में घुले सीसे के साथ प्रतिक्रिया कर ‘लेड सल्फाइड’ नामक ठोस खनिज बना देता है, जिसे आसानी से छानकर अलग किया जा सकता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान दूषित जल की अम्लीयता भी कम हो जाती है, जिससे बैक्टीरिया बेहतर तरीके से काम कर पाते हैं।
कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहे बैक्टीरिया
शोधकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि अत्यधिक अम्लीय और भारी धातुओं से भरे अपशिष्ट जल में बैक्टीरिया जीवित कैसे रहें। इसके लिए वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया को धीरे-धीरे अधिक अम्लीय और विषैले वातावरण का अभ्यस्त बनाया। इस रणनीति की मदद से बैक्टीरिया लगातार सक्रिय रहे और सीसे को स्थिर ठोस रूप में बदलते रहे।





