शहडोल:आम का सीजन चल रहा है और इन दिनों बाजार में तरह-तरह के आम देखने को मिल रहे हैं. दशहरी, तोतापरी, लंगड़ा ऐसे आमों से बाजार भरा पड़ा है, लेकिन विंध्य क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में आम की कई ऐसी वैरायटी भी पाई जाती हैं, जो देसी किस्में होती हैं और बिल्कुल अलग होती हैं. स्वाद में भी लाजवाब होता है. साथ ही आम के अलग-अलग उपयोग होते हैं, जिनका नाम भी अल-अलग होता है.
आम गांव वाला, अचार वाला, पाल वाला
विंध्य क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में इन दिनों आम की बहार है, क्योंकि यहां के गांव में जहां देखिये वहां आम दिख जाएंगे और अलग-अलग किस्म के दिखेंगे. मिठौरी गांव के रहने वाले दिव्यांश द्विवेदी बताते हैं कि “विंध्य क्षेत्र के गांव में आम की तो बात ही अलग होती है. आम का आप जिस तरह से उपयोग कर रहे हैं, उस किस्म के आम आपको मिल जाते हैं और वैसे ही उनके देसी नाम भी पड़ जाते हैं. अगर आम की चटनी खानी है, तो थोड़ी खट्टी चाहिए, उसके लिए अलग किस्म के आम होते हैं.
दाल में डाल के आम खाना है तो उसके लिए भी अलग किस्म के आम होते हैं. आम का पना बनाकर खाना है, तो उसके लिए भी देसी आम की किस्म है. आम को घर में पकाकर खाना है, जिसे पाल कहा जाता है, वो किस्म भी अलग होती है. आम का अचार बनाना है, वो किस्म भी अलग होती है, आम पाउडर बनाना हो या फिर अमावट तैयार करना हो, हर किस्म के लिए अलग आम आपको गांव में मिल जाएंगे. कुछ आम तो ऐसे भी मिलते हैं, जो पेड़ में पकने पर ही स्वादिष्ट होते हैं.
इसलिए ऐसे किस्म भी खास होते हैं. दिव्यांश बताते हैं कि गांव में यही तो मजा है, इन दिनों गांव-गांव में आम की बहार देखने को मिल रही है. ग्रामीण क्षेत्र में जितने आम उतने नाम भी देखने को मिलते हैं. भले ही इन आमों के नाम दशहरी, तोतापरी लंगड़ा जैसे फेमस नहीं हैं, लेकिन गांव में मिलने वाले इन आमों का स्वाद भी इनसे कम नहीं है.”
जैसा काम, वैसा आम
अंकित श्रीवास्तव बताते हैं कि “गांव में मिलने वाले इन देसी आम के नाम भी उनके क्वालिटी के हिसाब से रखे जाते थे. अंकित श्रीवास्तव अपने पुराने दिनों को याद करते हुए मुस्कुराने लगते है और तरह तरह के आम की किस्में गिनाने लगते हैं. वो बताते है की गांव में कई अलग-अलग नाम से आम मिलते हैं. उनके क्वालिटी के हिसाब से उनके नाम रखे जाते थे.
जैसे कटैया, बंबइया, सेमरहा, नुकही, धरती धमका जिसे बड़े साइज के लिए जाना जाता है, जटिलहा आम जिसमें जाली ज्यादा होती है. छोड़िहा छोटे कद का आम लेकिन पैदावार बम्पर, गंगाबारु, पैलहा आम जिसके साइज पर पड़ा नाम, किरहा, भमरहा, झंडहा, उमरहा आम इसका नाम उम्र दराज पेड़ की वजह से पड़ा. नरियरा आम इसके नारियल जैसे स्वाद पर पड़ा ये नाम. इसके अलावा निमहा, सिंदूरी, बिसैनधा, खिरौंहा, जीरौंहा, पिटटी पकने पर मीठी अगस्त तक चलने वाला अचार के लिए बेस्ट चपटे आकार का होता है. इस तरह से जिस क्वालिटी का आम वैसा देसी नाम यहां पड़ जाता है.”
गांव के इन देसी आम का राज क्या है ?
कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर मृगेंद्र सिंह बताते हैं कि “देखा जाए तो आम में नोटिफाई 2 से 3 हजार वैरायटी हैं, आम के वैरायटी की अगर बात करें तो इनकी पापुलैरिटी रीजन वाइज है. जैसे अपने नॉर्थ इंडिया में जो आम पसंद किए जाते हैं, वह अधिक मीठे होने चाहिए. उसमें भी दो तरह के होते हैं. एक काट के खाने वाले और दूसरे चूसने वाले, इसके अलावा इसकी उपयोगिता के हिसाब से और भी बहुत तरह के आम हैं. रीजन वाइज अलग-अलग वैरायटी की पापुलैरिटी है. मध्य और उत्तर भारत में दशहरी लंगड़ा जैसे आमों की डिमांड रहती है, चौसा है और सीजन के
क्रॉस पोलिनेटेड क्रॉप
शहडोल में खाने के लिए नोटिफाई वैरायटी है. इसके अतिरिक्त क्योंकि ये क्रॉस पोलिनेटेड क्रॉप है, और यहां पर ग्राफ्टेड आम भी लगाए जाते हैं. बीजू आम भी लगाया जाता है, उनको वैरायटी के हिसाब से नहीं जाना जाता है, उनको लोकल लोग अपना नाम दे देते हैं. उसकी यूटिलिटी को बहुत अच्छे से पहचानते हैं, जैसे अपने क्षेत्र में अचार डालने की बहुत परंपरा है. हर घर में आम के सीजन में अचार रखा जाता है.अब उसमें जैसे आम का अचार है, तो उसके लिए जो आम की क्वालिटी होनी चाहिए. उसमें उसका छिलका मोटा होना चाहिए, गुदा होना चाहिए और इसकी गुठली छोटी होनी चाहिए. जैसा बताया कि क्रॉस पोलिनेटेड क्रॉप है, तो अगर आप आम बीज से लगाते हैं और पता लगा कि आपने आधा किलो 1 किलो आम के बीज को लगाया था, 5 साल बाद जब वो फल दिया तो पता चला वो 50 ग्राम और 100 ग्राम का ही आम का साइज है, आप उसको निश्चित नहीं कर सकते हैं, कि वो कौन सा आम है.
अंत में आने वाला फल्ली आम ये बहुत बड़ा होता है.





