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छत्तीसगढ़ में ईसाई परिवारों ने धर्म के कारण पानी की सुविधा रोके जाने का आरोप लगाया

कांकेर जिले के अंतागढ़ इलाके में रहने वाले कुछ ईसाई परिवारों ने आरोप लगाया है कि उनके धर्म की वजह से उन्हें पानी और रोज़गार जैसी जरूरी सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है। यह बात प्रोग्रेसिव क्रिश्चियन अलायंस की ओर से जारी एक अपील में कही गई है।

संगठन के अनुसार, मदप्पा, भैंसगांव और बुरखापारा गांवों के कई ईसाई परिवारों को पिछले कई हफ्तों से नदी, तालाब, नल और हैंडपंप का इस्तेमाल करने से रोका जा रहा है। परिवारों का कहना है कि उन पर ईसाई धर्म छोड़कर “घर वापसी” कार्यक्रम में शामिल होने का दबाव बनाया जा रहा है।

जिला मसीह आस्था समाज के प्रतिनिधियों ने बताया कि उन्होंने 28 और 30 अप्रैल को पुलिस अधीक्षक और जिला कलेक्टर को लिखित शिकायत दी थी। उन्होंने कहा कि अप्रैल की शुरुआत में अधिकारियों से मौखिक रूप से भी मदद मांगी गई थी, लेकिन अब तक कई परिवार परेशानी झेल रहे हैं।

अपील में कहा गया है कि करीब 26 परिवार पानी की सुविधा नहीं मिलने से प्रभावित हैं। संगठन ने यह भी आरोप लगाया कि ईसाई परिवारों को मनरेगा में काम नहीं दिया जा रहा है, गांव के दूसरे कामों से दूर रखा जा रहा है और जंगल से मिलने वाली चीजों तक पहुंच में भी दिक्कत हो रही है। परिवारों को खेती और रोज़गार को लेकर भी धमकियां मिलने की बात कही गई है।

16 मई को समुदाय के कुछ प्रतिनिधि इलाके में पहुंचे थे। इस दौरान 32 गांवों के 60 से ज्यादा लोग इस मुद्दे पर चर्चा के लिए इकट्ठा हुए। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि 41 परिवारों को मनरेगा में काम नहीं मिला, जबकि 115 परिवारों को तेंदूपत्ता तोड़ने के काम में हिस्सा लेने से रोका गया। यह भी आरोप लगाया गया कि चार परिवारों की जलाऊ लकड़ी जबरन ले ली गई।

प्रोग्रेसिव क्रिश्चियन अलायंस ने कहा कि यह मामला संविधान में दिए गए बराबरी, भेदभाव से सुरक्षा, सम्मान के साथ जीने के अधिकार और धर्म की आज़ादी जैसे अधिकारों को लेकर चिंता पैदा करता है।

संगठन ने सरकार, मानवाधिकार समूहों और अन्य संस्थाओं से मामले में दखल देने और प्रभावित परिवारों को पानी, रोज़गार और सुरक्षा दिलाने की मांग की है।

ये आरोप संगठन की ओर से लगाए गए हैं। जिला प्रशासन की तरफ से फिलहाल कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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