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मेलोडी’ वाले मोहनलाल दयाल, एक आइडिया से Parle G को बनाया ब्रांड; ये है 100 साल पुरानी स्वदेशी कंपनी की कहानी

नई दिल्ली। ‘मेलोडी है चॉकलेटी’…यह एड जिंगल 90 के दशक में लोगों ने काफी सुना, अब एक बार फिर से मेलोडी सुर्खियों में है। जब से पीएम मोदी ने मेलोडी का पैकेट इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी (Giorgia Meloni) को गिफ्ट किया है तब से मेलोडी के चर्च होने लगे। मेलोडी चॉकलेट (Melody) , पारले प्रोडक्ट्स (Parle Products का उत्पाद है यह तो आप जरूर जान गए होंगे, लेकिन क्या यह जानते हैं कि इस कंपनी का इतिहास करीब 100 साल पुराना है और मेलोडी और पारले जी के जनक मोहनलाल दयाल चौहान हैं।पारले प्रोडक्ट्स की शुरुआत 1929 में चौहान परिवार ने की। आजादी से पहले के जमाने में जब देश में ज्यादातर सामान आयात होते थे उस समय मोहनलाल दयाल ने जर्मनी से बिस्किट बनाने की मशीनें मंगवाई और 60,000 रुपये का निवेश किया। आज से करीब 97 साल पहले 60 हजार रुपये की रकम बहुत मायने रखती थी।

5 बेटे और पिता की मेहनत ‘पारले जी’

मोहनलाल दयाल ने अपने पांच बेटों, मानेकलाल, पीतांबर, नरोत्तम, कांतिलाल और जयंतीलाल के साथ मिलकर विले पार्ले में एक छोटी फैक्ट्री स्थापित की। कंपनी ने जिस इलाके से अपनी शुरुआत की उसे ही अपना नाम ‘पारले जी’ बना लिया।दरअसल उस समय भारत में बिस्कुट अधिकतर आयात किए जाते थे और इन्हें महंगा फूड प्रोडक्ट माना जाता था, जिनका सेवन मुख्य रूप से ब्रिटिश अधिकारियों और धनी भारतीयों द्वारा किया जाता था, इसिलए भारतीय बाजारों में बिस्कुटों की उपलब्धता बहुत कम थी।

समय मशहूर हुआ जब कंपनी ने ग्लूकोज बिस्किट्स का उत्पादन शुरू किया। बताया जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कंपनी को ब्रिटिश सेना को बिस्कुट की आपूर्ति करने का लाइसेंस मिला था। इसके बाद पार्ले प्रोडक्ट का उत्पादन बढ़ा और पूरे देश में सप्लाई होने से कंपनी धीरे-धीरे भारतीय घरों में एक जाना-पहचाना नाम बन गई।

बाजार में कब आई ‘मेलोडी’?

को पारले प्रोडक्ट्स ने साल 1983 में पेश किया था, जो 80 और 90 के दशक में खूब प्रसिद्ध हुई। इस टॉफी को और ज्यादा लोकप्रिय बनाने में इसके मशहूर विज्ञापन और टैगलाइन का बहुत बड़ा हाथ था: “मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है? मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ!”

पारले ग्लूको से कैसे बना पारले जी

1947 में स्वतंत्रता के बाद, पार्ले ने खुद को विदेशी ब्रांडों के भारतीय विकल्प के रूप में स्थापित किया। कंपनी का बिस्किट सबसे पहले पार्ले ग्लूको के नाम से बाज़ार में आया था। हालांकि, 1960 के दशक में, इसके कई मिलते-जुलते उत्पाद बाज़ार में आ गए। बाज़ार में अपनी अलग पहचान बनाने के लिए, कंपनी ने बिस्किट का नाम बदलकर पार्ले-जी रख दिया, जिसमें “जी” का अर्थ ग्लूकोज़ है।दशकों बीतने के साथ, पार्ले-जी महज़ एक बिस्किट से कहीं बढ़कर बन गया। यह भारतीय जीवन का अभिन्न अंग बन गया। रेलवे स्टेशनों और चाय की दुकानों से लेकर स्कूल के लंच बॉक्स और घरों तक, यह बिस्किट लगभग हर जगह उपलब्ध था। 2011 में, ग्लोबल रिसर्च फर्म नीलसन ने कथित तौर पर पार्ले-जी को दुनिया का सबसे लोकप्रिय बिस्किट घोषित किया था।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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