जलालपुर (सारण)। जलालपुर प्रखंड के कई ग्रामीण इलाकों में इन दिनों सड़कों का नजारा किसी बड़े खलिहान से कम नहीं दिख रहा। सड़क पर फैले खोबी के पौधे, उन पर धीरे-धीरे गुजरते वाहन और किनारे बैठकर सूप से दाने फटकते मजदूर ग्रामीण जीवन के संघर्ष, मेहनत और जीविका की अनोखी तस्वीर पेश कर रहे हैं।
खेतों में उगाई जाने वाली फसल नहीं, बल्कि प्रकृति की देन कही जाने वाली खोबी आज गरीब परिवारों के लिए आय का मजबूत साधन बन गई है। इससे ग्रामीणों को आर्थिक संबल भी मिल रहा है।
प्रकृति का अनमोल उपहार
अशोक नगर चौखड़ा पंचायत के बकुलहां चंवर में करीब 30 हेक्टेयर भूमि तथा कुमना गांव के चंवर में लगभग 200 हेक्टेयर क्षेत्र में हर वर्ष खोबी प्राकृतिक रूप से उग आती है। इसकी खेती नहीं की जाती और न ही इसमें किसी तरह की लागत लगती है।
ग्रामीण इसे प्रकृति का अनमोल उपहार मानते हैं। यही उपज आज कई गरीब परिवारों की जीविका का आधार बनी हुई है।
वाहनों के गुजरने से दवनी का काम
स्थानीय बिंद समुदाय के लोग चंवरों से खोबी के पौधे काटकर सिर और कंधे पर ढोते हुए सड़क तक लाते हैं। घरों में पर्याप्त जगह नहीं होने के कारण सड़क को ही अस्थायी खलिहान बना दिया जाता है। पौधों को सड़क पर फैला दिया जाता है और वाहनों के गुजरने से दवनी का काम होता रहता है।
हर गुजरती गाड़ी के पहिए डंठलों से दाने अलग कर देते हैं। इसके बाद महिलाएं और मजदूर सूप से दानों को साफ करते हैं।
मेहनत और निगरानी के बल पर अच्छी आमदनी
इस कार्य से जुड़े राम अयोध्या बिंद, मीठू बिंद, मंजू बिंद, लक्ष्मी बिंद, इजलास बिंद और रामबली बिंद जैसे कई परिवार वर्षों से खोबी के सहारे अपना जीवन चला रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बिना पूंजी लगाए केवल मेहनत और निगरानी के बल पर अच्छी आमदनी हो जाती है।
दाने अलग करना बेहद कठिन कार्य
कुमना गांव निवासी लाल मोहर बिंद बताते हैं कि कुमना के चंवर में करीब 200 हेक्टेयर क्षेत्र में खोबी फैली हुई है। उन्होंने कहा कि चंवर से पौधे निकालना, उन्हें कंधे पर ढोकर सड़क तक लाना, कई दिनों तक धूप में सुखाना और फिर दवनी कर दाने अलग करना बेहद कठिन कार्य है। इस काम में करीब 20 से 25 परिवार जुड़े हुए हैं।
प्रत्येक किसान एक सीजन में लगभग दो क्विंटल तक खोबी निकाल लेते हैं। व्यापारी गांव में 200 से 300 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदारी करते हैं, जबकि बाजार में यही खोबी 500 रुपये किलो तक बिकती है।
500 से 700 रुपये किलो तक बिकती हैं मिठाइयां
काले रंग का यह छोटा लेकिन भारी दाना भूनने पर रामदाना की तरह फूल जाता है, हालांकि इसका आकार उससे थोड़ा बड़ा होता है। इससे बनने वाली खोबी की लाई और मिठाई बिहार की पारंपरिक खाद्य संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
उपवास, पूजा-पाठ, शादी-विवाह और अन्य मांगलिक अवसरों पर इसकी मांग काफी बढ़ जाती है। स्थानीय बाजारों में खोबी की लाई 300 से 400 रुपये किलो तथा इससे तैयार विशेष मिठाइयां 500 से 700 रुपये किलो तक बिकती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी खोबी से बनने वाली मिठाइयां घरेलू स्तर और छोटे कुटीर उद्योगों के माध्यम से तैयार की जाती हैं। ताजे दूध, देसी घी और मेहनतकश हाथों से बनने वाली यह मिठाई केवल स्वाद ही नहीं, बल्कि गांव की मिट्टी, प्रकृति की कृपा और संघर्षपूर्ण जीवन की मीठी पहचान भी अपने भीतर समेटे हुए है।





