भरतपुर लगातार दो साल से पानी की अच्छी आवक के कारण केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान की झीलें पूरी तरह सूख नहीं पाईं। फलस्वरूप एन ब्लाक की झील को छोड़कर अधिकांश झीलों में जलकुंभी छा गई है। और अब यह गर्मी के सीजन में प्रजनन करने वाले पक्षियों की नेस्टिंग को प्रभावित कर रही है। विशेषकर वेडर्स के लिए। क्योंकि वेडर्स उथले पानी, दलदल, झील किनारे पानी में नेस्ट बनाते हैं और भोजन तलाशते हैं। किंतु घना की झीलें जलकुंभी से भर गई हैं। जिससे इन्हें नेस्टिंग करने में परेशानी आ रही है। इसके अलावा झीलों के किनारे फिशिंग वर्ड किंग फिशर, बीटर्स और लेपिंग भी नेस्ट बनाते हैं, जिन्हें अब परेशानी हो रही है
ज्ञात रहे कि घना में करीब 9 वर्ग किलोमीटर एरिया में झीलें हैं, जो पक्षियों के लिए सुरक्षा और भोजन मुहैया कराती है। किंतु सी, डी, ई, के और एल ब्लाक की झीलें दो साल से जलकुंभी नहीं निकाली गई। इस कारण जलकुंभी भर गई है। इसमें बी, डी और ई ब्लाक में ज्यादा स्थिति गंभीर है। केवलादेव घना प्रशासन द्वारा युद्धस्तर पर जलकुंभी निकालने का अभियान चल रहा है। इसके तहत करीब 150 लोगों को लगाया गया है, किंतु जानकारों का कहना है कि यह समय गलत चुना गया है। क्योंकि यह समय नेस्टिंग का है। ऐसे में वेडर्स और फिशिंग वर्ड की एक्टिविटी प्रभावित हो रही है।
वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर नवीन शर्मा कहते हैं कि जलकुंभी में फ्लावरिंग होने से पहले यानी जनवरी/ फरवरी में निकाला जाना चाहिए था। ज्ञात रहे कि घना में ब्राउन विंग्स जैकाना, फीजन जैकाना, सैंडपाइपर, प्लोवर, ग्रीन बीटर्स, ब्ल्यू टेल्ड बीटर्स, लिटिल बीटर्स, लैपिंग, ब्लैक विंग्स स्टिल्ट, किंग फिशर, सारस आदि झीलों में फ्लोटिंग, उसके किनारे बैंक अथवा पानी से घिरे माउंट में नेस्ट बनाते हैं।
^तीन ब्लाकों की झीलों से इन दिनों बड़े पैमाने पर जलकुंभी निकालने का अभियान चलाया जा रहा है। स्टाफ और श्रमिकों को हिदायत दी गई है कि जलकुंभी निकालते समय पक्षियों की नेस्टिंग को ध्यान में रखें। इसलिए कई जगह जहां नेस्ट हैं, वहां जलकुंभी अभी नहीं निकाली जा रही है। अगले सीजन में झीलों में पानी भरने के लिए जलकुंभी निकालना बहुत जरूरी है।
– चेतन कुमार, बी.वी, डीएफओ, केएनपी





