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18 बाघ, 27 तेंदुओं की मौजूदगी के साथ कान्हा-पेंच कॉरिडोर में बालाघाट बना अहम ठिकाना

  • मध्य प्रदेश स्थित बालाघाट, कान्हा और पेंच टाइगर रिजर्व के बीच स्थित है। यह बाघों की आवाजाही और उनके बीच आनुवंशिक संपर्क बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
  • डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और मध्य प्रदेश वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण बालाघाट के लालबर्रा और कटंगी वन क्षेत्रों में 18 बाघ और 27 तेंदुए कैमरा ट्रैप में दर्ज हुए।
  • बालाघाट कोई टाइगर रिजर्व या राष्ट्रीय उद्यान नहीं है। यह सामान्य वनमंडल है, फिर भी यहां 24 स्तनधारी प्रजातियां दर्ज की गईं।
  • रिपोर्ट में सड़क, रेल, खनन, जंगलों के टूटने, जंगल की आग, आक्रामक पौधों और मानव-वन्यजीव संघर्ष को बड़ी चुनौतियां बताया गया है।

मध्य प्रदेश के दक्षिण बालाघाट के लालबर्रा और कटंगी वन क्षेत्रों में कैमरा ट्रैप से 18 बाघ और 27 तेंदुए दर्ज हुए। इसी सर्वे में 24 स्तनधारी प्रजातियां भी मिलीं। खास बात यह है कि ये आंकड़े किसी टाइगर रिजर्व या राष्ट्रीय उद्यान से नहीं, बल्कि कान्हा-पेंच कॉरिडोर में स्थित एक सामान्य वनमंडल से आए हैं।

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और मध्य प्रदेश वन विभाग की नई   उत्तर और दक्षिण बालाघाट वन मंडलों में बड़े मांसाहारी वन्यजीवों और जंगली खुरदार प्रजातियों की स्थिति बताती है कि बालाघाट सिर्फ बाघों के गुजरने का रास्ता नहीं है। यह अब बाघों, तेंदुओं और दूसरे वन्यजीवों के रहने का भी महत्वपूर्ण इलाका है। लेकिन रिपोर्ट यह भी बताती है कि इस क्षेत्र पर सड़क, रेल, खनन, कमजोर शिकार आधार, जंगल की आग और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसे दबाव बढ़ रहे हैं।

गुप्ता कहती हैं, “इन प्रभावों को कम करने के लिए महत्वपूर्ण वन्यजीव क्षेत्रों में नए खनन ब्लॉक आवंटित करने से बचना चाहिए। खदानों से जुड़ी सहायक संरचनाओं को जंगल के बाहर बनाया जाना चाहिए। खनिज या ओवरबर्डन का परिवहन सूर्यास्त से सूर्योदय के बीच बंद होना चाहिए और बंद हो चुकी खुली खदानों का व्यवस्थित पुनर्स्थापन प्राथमिकता से किया जाना चाहिए।”

कैमरा ट्रैप ने क्या दिखाया

रिपोर्ट के लिए नवंबर 2021 में दक्षिण बालाघाट के लालबर्रा और कटंगी वन क्षेत्रों में 71 कैमरा ट्रैप लगाए गए। ये कैमरे 215 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 25 दिनों तक सक्रिय रहे।

इन कैमरों में बाघों के 262 और तेंदुओं के 154 फोटो मिले। इन्हीं तस्वीरों के आधार पर 18 अलग-अलग बाघ और 27 अलग-अलग तेंदुए पहचाने गए।

रिपोर्ट में बाघों का घनत्व 3.72 प्रति 100 वर्ग किलोमीटर और तेंदुओं का घनत्व 6.67 प्रति 100 वर्ग किलोमीटर आंका गया। 18 में से 12 बाघ एक से ज्यादा बार कैमरे में दिखे। दो जगहों पर बाघों के प्रजनन के संकेत भी मिले। यह बताता है कि बालाघाट सिर्फ कॉरिडोर नहीं, बल्कि बाघों का सक्रिय आवास भी है।

कैमरा ट्रैप में कुल 24 स्तनधारी प्रजातियां दर्ज हुईं। इनमें बाघ और तेंदुए के अलावा ढोल (जंगली कुत्ते), भेड़िया, सियार, रीछ या स्लॉथ बेयर, गौर, सांभर, चीतल, नीलगाय, बार्किंग डियर और साही जैसी प्रजातियां शामिल हैं।

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया के महासचिव और सीईओ रवि सिंह ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा, “बालाघाट संरक्षित क्षेत्रों के बाहर बाघ संरक्षण की उम्मीद की किरण है। यह दिखाता है कि प्रबंधन की स्पष्ट दिशा, सहयोग और विज्ञान आधारित संरक्षण प्रयास गैर-संरक्षित जंगलों को भी वन्यजीवों के फलते-फूलते आवास में बदल सकते हैं।”

गुप्ता भी कहती हैं कि बालाघाट को केवल कॉरिडोर नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण आवास के रूप में देखना चाहिए। वे कहती हैं, “बालाघाट बड़े मांसाहारी वन्यजीवों, खासकर बाघों और तेंदुओं, के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां जंगली शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या अपेक्षाकृत कम है, लेकिन चीतल और सांभर का घनत्व मध्य भारत के कुछ संरक्षित क्षेत्रों, जैसे संजय-दुबरी टाइगर रिजर्व, वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व और गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान, के बराबर या उससे ज्यादा है। इसलिए बालाघाट को मुख्य रूप से एक आवास के रूप में देखा जाना चाहिए और इसे किसी भी संरक्षित क्षेत्र जितना संरक्षण महत्व मिलना चाहिए।”

आग, आक्रामक पौधे और संघर्ष

रिपोर्ट में लैंटाना, पार्थेनियम और दूसरे आक्रामक पौधों को बड़ी समस्या बताया गया है। ये पौधे स्थानीय घास और वनस्पतियों को दबा देते हैं। इससे चीतल, सांभर और दूसरे शाकाहारी वन्यजीवों के लिए भोजन और आवास कम हो सकता है।

गुप्ता कहती हैं कि प्रे-बेस (शिकार आधार) को मजबूत करने के लिए आवास प्रबंधन जरूरी है। उनके अनुसार, “आवास प्रबंधन प्रे-बेस को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इसे तीन मुख्य पहलुओं पर केंद्रित होना चाहिए, आक्रामक प्रजातियों का प्रबंधन, आर्द्रभूमियों का संरक्षण और आग प्रबंधन।”

जंगल की आग भी बालाघाट के लिए बड़ा खतरा है। आग से पेड़-पौधों के साथ घासभूमि, छोटे जीव, पक्षियों के घोंसले और शाकाहारी वन्यजीवों का चारा भी प्रभावित होता है। रिपोर्ट जंगल में लगने वाली आग के हॉटस्पॉट की पहचान, चेतावनी प्रणाली के बेहतर उपयोग, फायर लाइन के रखरखाव और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर जोर देती है।

गुप्ता कहती हैं कि आग प्रबंधन में रोकथाम और तेजी से कार्रवाई दोनों जरूरी हैं। आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच, प्रदूषण की निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी है।

आक्रामक पौधों पर वे कहती हैं कि इन्हें फैलने से पहले हटाना चाहिए। लेकिन इन्हें हटाना ही काफी नहीं है। इसे बड़े आवास बहाली कार्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा।

गुप्ता कहती हैं, “संघर्ष प्रबंधन के लिए मवेशी शिकार पर मुआवजा देने की व्यवस्था पहले से मौजूद है। लेकिन फसल नुकसान के मुआवजे के लिए त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था बनानी होगी, ताकि प्रतिशोध रोका जा सके और समुदायों के साथ संबंध बेहतर हों।”

संसाधन और निगरानी बढ़ाने की जरूरत

बालाघाट वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन यह टाइगर रिजर्व या राष्ट्रीय उद्यान नहीं है। इसलिए यहां संरक्षण और निगरानी के लिए उतने संसाधन नहीं हैं, जितने संरक्षित क्षेत्रों को मिलते हैं।

गुप्ता कहती हैं, “बालाघाट का मौजूदा दर्जा प्रादेशिक वन का है। इससे वन्यजीव आबादी और उनके आवास के प्रबंधन और निगरानी के लिए जरूरी वित्तीय संसाधन सीमित हो जाते हैं। बेहतर संरक्षण योजना के लिए वन अवसंरचना, जैसे वन शिविर और एंटी-पोचिंग कैंप, और कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाने के लिए अलग से फंड सुनिश्चित किया जाना चाहिए।”

योजना के तहत प्राथमिकता दी जाए। अभी कैमरा ट्रैप सर्वे दक्षिण बालाघाट की केवल दो रेंजों तक सीमित था। अगर इसे सभी रेंजों तक बढ़ाया जाए, तो पूरे बालाघाट क्षेत्र में वन्यजीवों की स्थिति बेहतर समझी जा सकेगी।

गुप्ता भी कहती हैं कि मध्य प्रदेश वन विभाग को एनटीसीए की “टाइगर रिजर्व के बाहर बाघ” परियोजना के तहत बालाघाट को प्राथमिक संरक्षण क्षेत्र के रूप में लेना चाहिए।

मध्य प्रदेश वन विभाग के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) शुभरंजन सेन ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा, “यह रिपोर्ट केवल संख्या और वितरण का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि सतत सुरक्षा, वैज्ञानिक प्रबंधन और समुदाय की भागीदारी से प्रादेशिक वन परिदृश्यों में क्या हासिल किया जा सकता है। बालाघाट से मिले सबक यह बताते हैं कि वन्यजीव केवल संरक्षित क्षेत्रों के भीतर सुरक्षित नहीं रहेंगे, बल्कि पूरे वन परिदृश्य में उन्हें सुरक्षित करना होगा।”

मध्य प्रदेश राज्य वन्यजीव बोर्ड ने दक्षिण बालाघाट के महत्वपूर्ण वन क्षेत्र में सोनेवानी संरक्षण रिजर्व के प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसे बाघों की आवाजाही और उनकी शिकार प्रजातियों के लिए अहम माना जा रहा है। गुप्ता के अनुसार, इस रिजर्व की प्रबंधन योजना स्थानीय समुदायों की भागीदारी से बननी चाहिए, ताकि वन्यजीव संरक्षण और समुदायों के दीर्घकालिक लाभ, दोनों को साथ लेकर एक नया मॉडल विकसित किया जा सके।

समुदायों की भूमिका

रिपोर्ट के अनुसार, बालाघाट जिले में 1,385 गांव और 692 ग्राम पंचायतें हैं। जिले की करीब 22.5 प्रतिशत आबादी आदिवासी समुदायों से आती है, जिनमें गोंड और बैगा प्रमुख हैं। यहां लोगों की आजीविका खेती, पशुपालन और जंगल से मिलने वाले उत्पादों पर निर्भर है।

रिपोर्ट कहती है कि संरक्षण योजनाओं में इन समुदायों की भागीदारी जरूरी है। संयुक्त वन प्रबंधन समितियों, वन समितियों और वन अधिकार कानून, 2006 के तहत सामुदायिक अधिकार धारकों को संरक्षण, आग प्रबंधन, ईकोटूरिज्म और स्थानीय उत्पादों के बाजार से जोड़ा जा सकता है।

गुप्ता कहती हैं कि स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी से संरक्षण को बड़ा लाभ मिल सकता है। उनके अनुसार, “स्थानीय समुदायों को योजना और प्रबंधन में शामिल करना संरक्षण के लिए बहुत लाभकारी हो सकता है। ईकोटूरिज्म, मिलेट, सब्जियों और गैर-काष्ठ वन उत्पादों (NTFP) जैसे स्थानीय उत्पादों की मूल्य श्रृंखला और बाजार विकास, और आग प्रबंधन जैसे कई रास्ते मौजूद हैं।”

उनका कहना है कि वन विभाग संयुक्त वन प्रबंधन समितियों और वन समितियों के माध्यम से स्थानीय समुदायों को जोड़ता है। लेकिन इन समितियों को मजबूत करना और समुदायों को फैसले लेने में ज्यादा भूमिका देना जरूरी है। वन अधिकार कानून, 2006 के तहत सामुदायिक अधिकार धारकों को समुदाय आधारित संरक्षण के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

समुदाय आधारित संरक्षण और वन अधिकारों पर काम करने वाले शोधकर्ता शरद लेले कहते हैं, “वन अधिकार कानून, 2006 समुदाय आधारित और लोकतांत्रिक संरक्षण का रास्ता दिखाता है। हमें संरक्षित क्षेत्रों के भीतर और आसपास के सभी गांवों के सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों (CFRR) को मान्यता देने से शुरुआत करनी चाहिए। यहां तक कि वन्यजीव संरक्षण कानून, जिसमें 2006 में संशोधन हुआ, भी यही कहता है।”

लेले, बेंगलुरु स्थित ATREE में पर्यावरण नीति और शासन के डिस्टिंग्विश्ड फेलो हैं। वे वन अधिकार, सामुदायिक वन संसाधन अधिकार और समुदाय आधारित संरक्षण पर काम करते हैं। वे मध्य प्रदेश में वन अधिकार अधिनियम (FRA) और पंचायत उपबंध विस्तार अधिनियम (PESA) के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए बनी मध्य प्रदेश राज्य टास्क फोर्स के सदस्य भी हैं।

लेले के अनुसार, कई जगहों पर समुदायों के अधिकारों को मान्यता देने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ रही है। वे कहते हैं, “इसके बजाय, आज कान्हा टाइगर रिजर्व के आसपास के गांवों, यहां तक कि बफर क्षेत्र में भी, CFRR दावों को वन विभाग द्वारा अवैध रूप से रोका जा रहा है और मध्य प्रदेश में बाकी जगहों पर भी यह प्रक्रिया अटकाई जा रही है।”

लेले संरक्षण के मौजूदा मॉडल में बदलाव की जरूरत बताते हैं। वे कहते हैं, “हमें अपने पूरे संरक्षण मॉडल पर फिर से विचार करने की जरूरत है और राज्य-नेतृत्व वाले, अलग-थलग संरक्षण क्षेत्रों के मॉडल से मिश्रित उपयोग वाले क्षेत्रों में समुदाय-नेतृत्व वाले सह-प्रबंधन मॉडल की ओर बढ़ना होगा।”

Manoj Mishra

Editor in Chief

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