परिवार की माली हालत इतनी खराब थी कि कई बार बुनियादी जरूरतों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था. लेकिन उस धुएं और चाय की खुशबू के बीच हिमांशु ने अपने परिवार की गरीबी की जंजीरों को तोड़ने का सपना देखा था. उन्होंने तय किया था कि वे इस अभाव भरी जिंदगी से बाहर निकलेंगे. बिना किसी कोचिंग के, बिना किसी बड़े गाइडेंस के और सिर्फ इंटरनेट और पुरानी किताबों के सहारे हिमांशु ने देश की सबसे कठिन परीक्षा की तैयारी शुरू की. आखिरकार बनकर उन्होंने अपना सपना पूरा कर लिया.
बचपन का संघर्ष और चाय की दुकान का एक कोना
हिमांशु गुप्ता का जन्म उत्तराखंड के एक छोटे से गांव में हुआ था, लेकिन बेहतर भविष्य की तलाश में उनका परिवार उत्तर प्रदेश के बरेली आ गया. यहां उनके पिता ने जीवन यापन के लिए चाय की दुकान शुरू की. आईएएस हिमांशु गुप्ता बताते हैं कि स्कूल के बाद वे अक्सर पिता की दुकान पर जाते थे. वहां उन्होंने न केवल चाय बनाना सीखा, बल्कि लोगों के ताने और गरीबी का कड़वा स्वाद भी सहा. लेकिन यही वो जगह थी जहां उन्होंने अखबारों के जरिए बाहरी दुनिया को पढ़ना शुरू किया.
बिना कोचिंग के दिल्ली विश्वविद्यालय तक का सफर
आईएएस हिमांशु गुप्ता की मेधा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा में टॉप किया और दिल्ली यूनिवर्सिटी के टॉप हिंदू कॉलेज में दाखिला लिया. दिल्ली आना उनके लिए किसी Culture Shock से कम नहीं था. उनके पास रहने के लिए पैसे नहीं थे और अंग्रेजी बोलना भी उनके लिए बड़ी चुनौती थी. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने ट्यूशन पढ़ाई, स्कॉलरशिप हासिल की और अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठाया
तीन बार की मेहनत और अटूट विश्वास
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए हिमांशु गुप्ता ने किसी महंगी कोचिंग का सहारा नहीं लिया. उन्होंने खुद नोट्स बनाए और लाइब्रेरी में घंटों बिताए. उनका सफर आसान नहीं रहा. उन्होंने कुल तीन बार परीक्षा दी. पहले अटेंप्ट में वे IRTS (इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस) के लिए चुने गए, दूसरे में IPS के लिए, लेकिन उनका लक्ष्य तो सिर्फ IAS था. आखिरकार अपने तीसरे प्रयास में उन्होंने आईएएस अफसर बनने का अपना सपना पूरा किया.
पिता की आंखों में गर्व के आंसू
जिस दिन यूपीएससी सीएसई रिजल्ट आया, हिमांशु गुप्ता के पिता हमेशा की तरह अपनी दुकान पर थे. जब उन्हें पता चला कि उनका बेटा अब ‘कलेक्टर’ बन गया है, तो उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े. वो हाथ जो कभी ग्राहकों को चाय देते थे, उस दिन अपने बेटे की सफलता की मिठाई बांट रहे थे. हिमांशु ने साबित कर दिया कि सफलता का रास्ता किसी बड़े शहर की कोचिंग से नहीं, बल्कि आपकी मेहनत की गलियों से होकर गुजरता है.हिमांशु गुप्ता की कहानी सिखाती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, अगर आपके इरादे फौलादी हैं तो आसमान में भी सुराख किया जा सकता है.





