बुरहानपुर :जहां लोगों को गर्मी की आहट से ही टेंशन होने लगती है वहीं आदिवासी परिवारों के लिए गर्मी की दस्तक खुशियां लेकर आती है. आदिवासी इलाकों में लोग मार्च के आगमन का बेसब्री से इंतजार करते हैं. आदिवासी परिवारों में मार्च, अप्रैल और मई खुशियां लेकर आता है. परिवार के बच्चों से लेकर बुजुर्ग इन 3 माह बेहद व्यस्त हो जाते हैं अपनी आजीविका की गाड़ी आगे चलाने के लिए. फरवरी के अंतिम सप्ताह से महुआ के पेड़ों में फल आने शुरू हो जाते हैं.
महुआ के इन फलों को इकट्ठा करने के लिए आदिवासी परिवारों के साथ ही गांवों के गरीब परिवार सुबह से लेकर शाम तक व्यस्त रहते हैं. महुआ के फूल के बाद इस पेड़ में फल आते हैं, जिसे गुली कहते हैं. गुली तोड़कर भी आदिवासी परिवार ठीकठाक इनकम कर लेते हैं.
बुरहानपुर के जंगलों में आई बहार
आजकल बुरहानपुर जिले के आदिवासी बाहुल्य नेपानगर, खकनार और धुलकोट क्षेत्र के जंगलों में महुआ बीनने का काम जोर-शोर से चल रहा है. बाकड़ी गांव के घने जंगलो में महुआ के पेड़ों से “महुआ फूल” पानी की तरह टपक रहे हैं. इस समेटने के लिए आदिवासी परिवार अलसुबह घर से टोकनियां और अन्य बर्तन लेकर निकल पड़ते हैं. तड़के सुबह से लेकर दोपहर तक महुआ बीनने का काम चलता है. कई जगहों पर सुबह के साथ ही शाम को भी महुआ बीनने में ग्रामीण व्यस्त रहते हैं.
आदिवासी लोगों का कहना है कि ये महुआ के फूल उनके लिए खजाने से कम नहीं है. दो से ढाई माह का उन्हें एक प्रकार से रोजगार में मिल जाता है. महुआ बीनने वालों ने बताया कि पूरे दिन व रातभर महुआ पेड़ों से फूल गिरते हैं. लेकिन महुआ की ज्यादा बारिश सुबह 5 बजे से लेकर दोपहर 12 बजे तक होती है. 2 से 3 माह की मेहनत से उन्हें अच्छी खासी कमाई हो जाती है. इसलिए आदिवासी बाहुल्य इलाकों में इन दिनों लोगों में काफी उत्साह देखा जा रहा है.
महुआ का पेड़ प्रकृति का वरदान
महुआ का पेड़ आदिवासियों के लिए कुदरत का वरदान है. इसके फूल और फल से उन्हें रोजगार मिलता है. रोजगार की खातिर ये लोग चिलचिलाती धूप की परवाह नहीं करते. दो से तीन माह एक ही काम रहता है. महुआ बीनना और इन्हें आंगन या घर के बाहर सुखाना. महुआ सूखने के बाद इसे बाजार में बेच दिया जाता है. इससे आदिवासी परिवारों को ठीकठाक आय हो जाती है. महुआ बीनने वालेसुरेश जमराबताते हैं “आजकल महुआ के पेड़ो पर फूलों की भरमार है. महुआ सूखने के बाद बाजारों में बेचकर अच्छी आय हो जाती है.”
महुआ से ही रोजी-रोटी कमाते हैं आदिवासी
नेपानगर क्षेत्र के लोकेश बताते हैं “गर्मी का मौसम आदिवासियों के लिए खुशहाली का प्रतीक है. यह मौसम उनके लिए फायदेमंद साबित होता है, क्योंकि जंगलों में महुआ का फूल बड़ी मात्रा में आते हैं, जिसके चलते सुबह से ही बच्चे, बूढ़े और युवा भी महुआ बीनने पहुंच जाते हैं, वह अधिक मात्रा में महुआ इकट्ठा करते हैं. इसी से रोजी रोटी कमाते हैं, इससे प्रत्येक परिवार को करीब 40 से 50 हजार तक की इनकम होती है.”




