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इतिहास में पहली बार दृष्टिबाधित महिला बनेंगी जज, केरल ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा में किया क्वालिफाई

इतिहास में पहली बार केरल ज्यूडिशियल सर्विस में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के चयन के लिए आयोजित केरल ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा, 2025 में दृष्टिबाधित महिला ने क्वालिफाई किया। कन्नूर जिले की रहने वाली थान्या नाथन सी. ने बेंचमार्क विकलांगता वाले व्यक्तियों की मेरिट लिस्ट में टॉप किया।

पूरी तरह से दृष्टिहीन होने के बावजूद थान्या की सफलता की कहानी सच में प्रेरणादायक है। उन लोगों को उम्मीद देती है, जो जीवन में ऐसी ही मुश्किलों का सामना करते हैं। LiveLaw ने इस मौके पर थान्या से बात की और उनकी सफलता की कहानी जानी।

एक वकील के तौर पर उनका प्रोफेशनल करियर अगस्त 2024 में शुरू हुआ, जब उन्होंने बार में अपना नाम दर्ज कराया। तब से 24 साल की थान्या पिछले डेढ़ साल से अपने सीनियर, एडवोकेट सुमार कुमार के. के साथ कन्नूर में एक्टिव रूप से प्रैक्टिस कर रही हैं।

थान्या ने बताया कि उन्होंने परीक्षा की नोटिफिकेशन आने के बाद तैयारी शुरू की और पहले से कोई तैयारी नहीं की थी। उन्होंने बिना किसी कोचिंग के परीक्षा की तैयारी की और प्रीलिम्स और मेन राउंड में सेल्फ-स्टडी की। चूंकि उन्हें इंटरव्यू देने का कोई अनुभव नहीं था, इसलिए थान्या ने तिरुवनंतपुरम में प्रैक्टिस कर रहे एडवोकेट संतोष से मदद ली।

उन्होंने कोर्ट प्रैक्टिस के महत्व पर जोर दिया और बताया कि ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा देते समय भी उन्होंने कोर्ट रूम से दूर न रहने की कोशिश की और प्रैक्टिस जारी रखी।

उन्होंने याद किया कि अपने प्रोफेशनल सफर की शुरुआत में वह इस बात को लेकर टेंशन में थीं कि क्या कोर्ट रूम उन्हें स्वीकार करेगा, लेकिन यह कोई मुद्दा नहीं निकला, क्योंकि सभी बहुत मिलनसार और मददगार थे। उन्होंने कहा कि वह प्रोफेशनली बहुत खुश हैं क्योंकि सभी ज्यूडिशियल अधिकारी बहुत सपोर्टिव थे और कोर्ट रूम में अच्छा माहौल बनाने की कोशिश करते थे।

उन्होंने कोर्ट रूम में आने वाली कुछ मुश्किलों के बारे में भी बात की, जिनमें मुख्य यह थी कि वकील अंदर गैजेट्स का इस्तेमाल नहीं कर सकते। चूंकि अभी केरल में पेपरलेस कोर्ट पूरी तरह से लागू नहीं हुए, इसलिए उन्हें अपने केस पर बहस करने के लिए ब्रेल में नोट्स तैयार करने पड़ते थे। हालांकि उन्हें यह कोई समस्या नहीं लगी, लेकिन उन्हें लगा कि अगर टेक्नोलॉजी को कोर्ट रूम में और बेहतर तरीके से लाया जाए तो इससे अधिकतम आज़ादी सुनिश्चित होगी।

उन्होंने याद करते हुए कहा कि अपने कॉलेज के दिनों में भी उन्हें टेक्नोलॉजी पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहना पड़ता था और उन्हें लगा कि अगर आसानी से उपलब्ध स्टडी मटीरियल होते तो उनकी मुश्किलें कम हो जातीं। हमने उनसे एक वकील के तौर पर अपने प्रैक्टिस के दौरान देखे गए अच्छे बदलावों के बारे में भी पूछा और उनका जवाब था कि हालांकि बार में ज़्यादा बदलाव नहीं हुए, लेकिन उन्होंने बेंच में कई पॉजिटिव बदलाव होते देखे हैं। उन्होंने खास तौर पर सबूत लेने के नए तरीके, वॉइस-टू-टेक्स्ट का ज़िक्र किया, जिसे उन्होंने हाथ से लिखे पुराने तरीकों के मुकाबले एक “क्रांति” बताया। उन्हें लगा कि इससे सबको बराबर का मौका मिलेगा और समानता आएगी।

जो दिव्यांग उम्मीदवार ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, उनके लिए उन्होंने एक मैसेज दिया। थान्या कहती हैं कि लगातार कोशिश और कड़ी मेहनत से यह कामयाबी हासिल की जा सकती है, लेकिन बिना दिव्यांग लोगों के मुकाबले ज़्यादा मेहनत करनी होगी। वह उनसे अपनी पूरी क्षमता से अपने लक्ष्यों की ओर तैयारी करने के लिए भी कहती हैं।

थान्या कहती हैं कि अपनी इस यात्रा के दौरान उन्हें अपने माता-पिता और परिवार से सपोर्ट मिला। यह उनके सीनियर थे, जिन्होंने उन्हें प्रोत्साहित किया और ज्यूडिशियल परीक्षा के लिए अप्लाई करने को कहा।

आखिरी मैसेज के तौर पर वह कहती हैं कि बदलाव होने चाहिए और कुछ भी स्थायी नहीं है। क्योंकि न्यायपालिका को आखिरी व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए, इसलिए उसे सभी लोगों, खासकर हाशिए पर पड़े और दबे-कुचले लोगों को शामिल करने में सक्षम होना चाहिए।

पिछले साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी व्यक्ति को सिर्फ़ शारीरिक दिव्यांगता के कारण ज्यूडिशियल सर्विस में भर्ती के लिए विचार करने से मना नहीं किया जा सकता।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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