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महंगे केमिकल हुए फेल तो किसानों ने अपनाए घरेलू उपाय, चूल्हे की राख, गोबर से जंगली सुअर, नीलगाय दूर भगाए!

समस्तीपुर. समस्तीपुर जिले के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों किसानों की लहलहाती फसल पर जंगली जानवरों का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है. रबी फसल के तैयार होने के समय नीलगाय, सुअर और अन्य जंगली जानवर खेतों में घुसकर भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं. सबसे ज्यादा नुकसान नीलगाय द्वारा किया जा रहा है, जो रात के समय खेतों में घुसकर फसल को रौंद देती है. महीनों की मेहनत और लागत पर पानी फिरता देख किसान चिंतित हैं. सरकारी स्तर पर स्थायी समाधान नहीं मिलने के कारण ग्रामीण किसान अब अपने पारंपरिक ज्ञान और घरेलू उपायों पर भरोसा कर रहे हैं.

घरेलू नुस्खे आ रहे काम
गली जानवरों से फसल बचाने के लिए किसान अब ऐसे घरेलू नुस्खे अपना रहे हैं, जिन पर खर्च भी कम आता है और असर भी दिख रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि घर में खाना बनाने के बाद जलावन से बची राख को खेत में फसल के ऊपर या मेड़ के आसपास छिड़क देने से जंगली जानवर दूर रहते हैं. राख की गंध और उसका स्वाद जानवरों को पसंद नहीं आता, जिससे वे खेत के पास नहीं आते. इसके अलावा कुछ किसान पशुओं के गोबर के अवशेष और अन्य जैविक कचरे का भी इस्तेमाल कर रहे हैं.

फसल और मिट्टी, दोनों सुरक्षित
कई किसानों ने पहले बाजार में मिलने वाले रासायनिक पदार्थों और गंधक युक्त दवाओं का भी प्रयोग किया, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिले. महंगे होने के बावजूद इन उपायों से जंगली जानवरों पर ज्यादा असर नहीं पड़ा. इससे किसान आर्थिक रूप से भी परेशान हुए. ऐसे में किसानों ने पुराने और आजमाए हुए घरेलू नुस्खों की ओर रुख किया, जो आसानी से उपलब्ध हैं और पर्यावरण के लिए भी नुकसानदेह नहीं हैं. ग्रामीणों का मानना है कि ये उपाय प्राकृतिक हैं, इसलिए फसल और मिट्टी दोनों सुरक्षित रहती हैं.

उन्होंने बाजार से खरीदी गई गंधक वाली चीजों का छिड़काव भी किया, लेकिन उसका खास असर नहीं दिखा. मजबूरी में उन्होंने घरेलू नुस्खों को अपनाया. उन्होंने बताया कि घर में खाना बनाने के बाद जो जलावन का अवशेष बचता है, यानी राख, उसी का छिड़काव वह अपनी फसल में करते हैं.

इसके साथ ही कभी-कभी गाय या भैंस के गोबर को पानी में घोलकर खेत में डाल देते हैं. इससे निकलने वाली तेज गंध से जंगली जानवर परेशान होकर खेत से दूर रहते हैं. किसान का कहना है कि यह नुस्खा उनके इलाके में काफी प्रसिद्ध है और इससे फसल को काफी हद तक सुरक्षित रखा जा रहा है.

Manoj Mishra

Editor in Chief

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