महासमुंद. छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में पारंपरिक खेती के साथ-साथ अब ग्रामीण युवा पशुपालन और पोल्ट्री फार्म जैसे व्यवसायों की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं. इसी कड़ी में महासमुंद जिले के उड़ेला गांव निवासी घनश्याम रात्रे ने पोल्ट्री फार्म व्यवसाय को अपनाकर गांव में ही रोजगार और अच्छी आमदनी का रास्ता तैयार किया है. घनश्याम रात्रे पिछले तीन वर्षों से पोल्ट्री फार्म का सफल संचालन कर रहे हैं और इससे उन्हें खेती की तुलना में कहीं अधिक लाभ मिल रहा है. घनश्याम ने लोकल 18 को बताया कि उनका पोल्ट्री फार्म पूरी तरह गांव में स्थित है, जहां उन्होंने करीब तीन हजार मुर्गियों को पालने की क्षमता वाला शेड तैयार किया है. उन्होंने यह काम अचानक नहीं शुरू किया बल्कि आसपास के क्षेत्रों में चल रहे पोल्ट्री फार्म को देखकर पहले जानकारी जुटाई. कुछ फार्म में जाकर कामकाज को नजदीक से समझा और जब उन्हें यह भरोसा हो गया कि पोल्ट्री फार्म व्यवसाय से अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है, तब उन्होंने अपना खुद का बिजनेस शुरू करने का निर्णय लिया.घनश्याम के अनुसार, पोल्ट्री फार्म खोलने में उन्हें लगभग 7 से 8 लाख रुपये की शुरुआती लागत आई. इसमें शेड निर्माण, जरूरी उपकरण और अन्य व्यवस्थाएं शामिल हैं. वर्तमान में वह एक शिफ्ट में तीन हजार मुर्गी पालते हैं, जिससे उन्हें 60 से 80 हजार रुपये तक का शुद्ध लाभ होता है. सालभर में इस व्यवसाय में करीब 6 से 7 शिफ्ट होती हैं, जिससे वार्षिक आमदनी अच्छी हो जाती है. उनका कहना है कि खेती की तुलना में पोल्ट्री फार्म से नियमित और ज्यादा आय प्राप्त हो रही है.ब्रूडिंग की विशेष व्यवस्था
घनश्याम रात्रे ने आगे बताया कि वह सगुना कंपनी से जुड़े हुए हैं. कंपनी की ओर से उन्हें 40 ग्राम वजन वाले चूजे उपलब्ध कराए जाते हैं. इन चूजों को फार्म में लाने के बाद ब्रूडिंग की विशेष व्यवस्था करनी होती है. इसके लिए हेलोजन लाइट जलाकर तापमान नियंत्रित रखा जाता है और बच्चों की तरह उनकी देखभाल करनी पड़ती है. शुरुआती एक सप्ताह चूजों के लिए सबसे संवेदनशील समय होता है, जिसमें विशेष ध्यान देना जरूरी होता है. उन्होंने बताया कि समय-समय पर दाना और साफ पानी देना बेहद जरूरी है. खासकर ठंड के मौसम में देखभाल और बढ़ जाती है क्योंकि ज्यादा ठंड होने पर चूजे एक-दूसरे के ऊपर चढ़ जाते हैं, जिससे नीचे दबे चूजों की मौत का खतरा रहता है, इसलिए तापमान संतुलन बनाए रखना बहुत जरूरी है.फार्म में बोर होना अनिवार्य
पानी की व्यवस्था को लेकर घनश्याम रात्रे ने बताया कि फार्म में बोर होना अनिवार्य है. इससे ऑटोमेटिक ड्रिंकर लगाए जाते हैं, जिससे जितनी जरूरत होती है, उतना ही पानी मुर्गियों को मिलता है. चूजों को कम से कम 40 से 45 दिन तक पालना होता है. कंपनी से जुड़ने के कारण उन्हें चूजे, दाना और दवाइयां समय पर मिल जाती हैं, जिससे जोखिम भी कम होता है. घनश्याम रात्रे का कहना है कि गांव जैसे क्षेत्र में पोल्ट्री फार्म व्यवसाय एक बेहतर विकल्प बनकर उभरा है. इससे न केवल उन्हें अच्छी आमदनी हो रही है बल्कि अन्य ग्रामीणों को भी इस व्यवसाय के लिए प्रेरणा मिल रही है.
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