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Gustakhi Maaf: श्मशान, मंदिर और पानी

-दीपक रंजन दास
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक बार फिर सभी हिन्दुओं को समान समझे जाने की वकालत की है। व्यापक अर्थ में भारतभूमि पर जन्मा वह हर व्यक्ति हिन्दू है जिसका धर्म परिवर्तित नहीं हुआ हो। काशी विश्वनाथ बाबा के दर्शन करने के बाद उन्होंने वाराणसी के जिमखाना मैदान में युवाओं को संबोधित करते हुए ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि जात-पांत से ऊपर उठकर श्मशान, पानी और मंदिर सबके बीच साझा होना चाहिए। इसका सीधा सा तात्पर्य है कि भागवत ने सनातन के पैरोकारों की दुखती रग को छेड़ दिया है। हिन्दुओं में उच्च वर्ण के लोग स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं। उन्हें ऐसा लगता कि कुछ चीजों पर केवल उनका अधिकार हो सकता है। सदियों से चली आ रही यह परिपाटी धुंधलाई जरूर है पर अभी भी इसके चिन्हों को देखा जा सकता है। कुछ राज्यों में तो ऊंच-नीच की भावना इतनी अधिक है कि इसके लिए किसी की जान लेने से लेकर पूरी की पूरी बस्ती जला देने की घटनाएं तक हो जाती हैं। गांव-गांव में तो स्थिति बुरी है ही, शहरों में भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। ये भेदभाव सनातन को कमजोर करती है। इसे संघ न केवल महसूस करता है बल्कि वह इसे ठीक करने की कोशिश भी करता है। कई मौकों पर नागपुर सांसद तथा राजमार्ग एवं सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी भी संघ की इस सोच का समर्थन करते रहे हैं। अपने अंदाज में वो खुल कर कहते हैं कि जिसने भी की जात-पांत की बात, उसे कस कर मारूंगा लात। दरअसल, विसंगतियां प्रत्येक समाज में हैं। पर सामाजिक मूल्य समय के साथ बदलते भी हैं। जो इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पाता, उसकी जड़ें आंधियों में उखड़ जाया करती हैं। आंधी और तूफान का सामना करने के लिए लचीलापन का होना जरूरी है। इसलिए भागवत आईआईटी के छात्रों से अपील करते हैं कि वे हिन्दुत्व की इस भावना को समझें और आत्मसात करें। ताकि कम से कम शिक्षित लोगों के मन से दुविधा खत्म हो सके। यह एक कटु सत्य है कि भारत में आज जितने भी हिन्दू, मुसलमान, मसीही या अन्य धर्म-पंथों के मानने वाले हैं, वो सभी कभी न कभी हिन्दू ही थे। किसी का परिवार तीन पीढ़ी पहले तो किसी का चार पीढ़ी पहले दूसरे धर्म में चला गया। आज इन सभी की अच्छी खासी संख्या भारतीय समाज में है। चूंकि ये सभी प्रचारित धर्म हैं इसलिए ये सभी एक गुरू, एक ग्रंथ को मानने वाले भी हैं। इनमें विचलन न के बराबर है। दूसरी तरफ हिन्दुत्व भिन्न-भिन्न मान्यताओं और परम्पराओं को समेटे हुए है। यदि इनके बीच सामंजस्य नहीं बैठ पाया तो खुद को सनातनी कहने वाले खुद अल्पसंख्यक की श्रेणी में आ जाएंगे। अब तक जो हुआ सो हुआ, पर भारत की आने वाली पीढिय़ों के मन से इस विष बेल को उखाडऩा ही होगा वरना समाज यूं ही टूट कर बिखऱता रहेगा।

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Manoj Mishra

Editor in Chief

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