देश दुनिया

भारतीय नर्सों के लिए अमेरिका क्यों है सपनों की मंजिल

25 साल की एंजेल वर्गीज की भविष्य की योजना एकदम स्पष्ट है. दक्षिण भारत के केरल राज्य के कोच्चि शहर में ‘वेलकेयर कॉलेज ऑफ नर्सिंग’ से नर्सिंग की पढ़ाई पूरी करने वाली एंजेल ने एनसीएलईएक्स परीक्षा पास कर ली है, जो अमेरिका में रजिस्टर्ड नर्स बनने के लिए जरूरी लाइसेंस परीक्षा है. अब वह अपनी मंजिल के लिए जरूरी काम का अनुभव (वर्क एक्सपीरियंस) हासिल कर रही हैं. इसके बाद, वह इंग्लिश टेस्ट (आईईएलटीएस) देंगी. उन्हें उम्मीद है कि वह जल्द ही न्यूयॉर्क जा सकेंगी, जहां उनके भाई पहले से ही बसे हुए हैं.

वर्गीज ने डीडब्ल्यू को बताया, “मैं हमेशा से अमेरिका में काम करना चाहती थी. वहां सीखने, पेशेवर तौर पर आगे बढ़ने और भविष्य बनाने के बेहतर मौके मिलते हैं. मुझे पता है कि इस प्रक्रिया में समय लगता है, लेकिन मैं इंतजार करने को तैयार हूं.”

कितना लंबा होता है नर्सों का अमेरिका जाने का इंतजार

कोच्चि से लगभग 100 किलोमीटर दूर कोट्टायम में, 26 साल की सुसान कुरियन भी इसी सफर में आगे बढ़ रही हैं. अमेरिकी नियोक्ताओं के हिसाब से जितने क्लीनिकल अनुभव की जरूरत होती है उसे पूरा करने के बाद, अब वह एक रिक्रूटमेंट एजेंसी के साथ मिलकर काम कर रही हैं. यह एजेंसी उनके क्रेडेंशियल वेरिफिकेशन (डिग्रियों और दस्तावेजों की जांच) को पूरा करने और किसी अमेरिकी अस्पताल से नौकरी का ऑफर दिलाने में उनकी मदद कर रही है.

कुरियन ने डीडब्ल्यू को बताया, “कागजी कार्रवाई लंबी और मुश्किल है, लेकिन मेरा लक्ष्य नहीं बदला है. मैं अमेरिका में ही अपना करियर बनाना चाहती हूं. मुझे उम्मीद है कि सब कुछ ठीक होगा.”

केरल की हजारों युवा नर्सों के लिए अमेरिका ही उनकी सबसे पसंदीदा जगह बनी हुई है. यह सफर कभी भी आसान या जल्दी पूरा होने वाला नहीं होता. इसमें अक्सर कई साल की परीक्षाएं, कागजी कार्रवाई और लंबा इंतजार शामिल होते हैं. लेकिन बेहतर सैलरी, करियर में तरक्की और अंतरराष्ट्रीय अनुभव का भरोसा उन्हें लगातार अपनी तरफ खींचता है.

भारतीय नर्सों की इस भारी मांग की बड़ी वजह  है, जो अपने यहां कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है. अमेरिकी ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स का अनुमान है कि साल 2024 से 2034 के बीच वहां हर साल रजिस्टर्ड नर्सों के लिए 1,89,100 नए पद खाली होंगे. इसकी मुख्य वजह बुजुर्गों की बढ़ती आबादी और रिटायर होने वाले हेल्थकेयर स्टाफ की बड़ी तादाद है. अस्पताल लगातार विदेशों से भर्ती कर रहे हैं और भारत प्रशिक्षित स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों का एक बहुत ही महत्वपूर्ण जरिया बनता जा रहा है.

इमिग्रेशन प्रोसेस जल्दी से जल्दी शुरू करने की कोशिश 

चूंकि भारतीय आवेदकों को नौकरी के आधार पर मिलने वाले वीजा के लिए सबसे लंबे इंतजार का सामना करना पड़ता है. इसलिए, जो नर्सें आज यह प्रक्रिया शुरू कर रही हैं, उन्हें अमेरिकी इमिग्रेंट वीजा पाने के लिए 10 साल से भी ज्यादा समय लग सकता है. इसके बावजूद, केरल में रिक्रूटर लगातार नए उम्मीदवारों का रजिस्ट्रेशन कर रहे हैं.

विदेश में काम करने के लिए स्वास्थ्यकर्मियों को लाइसेंस और भाषा परीक्षाओं की तैयारी कराने वाली तिजूज एकेडमी के ऑपरेशंस मैनेजर लूई टेरेंस ने बताया, “हां, हम आवेदनों की प्रोसेसिंग लगातार जारी रखे हुए हैं.”

टेरेंस ने कहा, “केरल की नर्सें बहुत अच्छी तरह से प्रशिक्षित होती हैं, बढ़िया अंग्रेजी बोलती हैं और अपने काम के प्रति समर्पण के लिए जानी जाती हैं. आज भी बहुत सी नर्सें शानदार सैलरी, काम के अच्छे माहौल और लंबे समय के करियर के अवसरों के कारण अमेरिका को ही सपनों की मंजिल मानती हैं.”

खाली बैठकर इंतजार करने के बजाय, कई नर्सें इमिग्रेशन की प्रक्रिया जल्दी शुरू कर देती हैं. रिक्रूटमेंट एजेंसियां उन्हें एनसीएलईएक्स परीक्षा पास करने, क्रेडेंशियल वेरिफिकेशन पूरा करने और अमेरिका के अस्पतालों से नौकरी के ऑफर पाने में मदद करती हैं.

एक बार इमिग्रेंट पिटीशन फाइल हो जाने के बाद, उन्हें एक ‘प्रायोरिटी डेट’ मिलती है, जिससे वीजा की कतार में उनकी जगह पक्की हो जाती है.

विदेशों में नर्सों की भर्ती करने वाली एक बड़ी एजेंसी ‘अफनिक्स इंटरनेशनल’ के एक सीनियर अधिकारी ने डीडब्ल्यू से कहा, “वीजा बैकलॉग के बावजूद हम लगातार अमेरिकी वीजा के आवेदन दाखिल कर रहे हैं. हमें उम्मीद है कि जल्द ही यह प्रक्रिया सुचारू हो जाएगी.”

वीजा के इंतजार के दौरान और जगहों पर काम का अनुभव जुटाने से होता है फायदा

इंतजार के दौरान बहुत कम नर्सें ही भारत में रहती हैं. इसके बजाय, कई नर्सें यूएई, सऊदी अरब, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों में अपना करियर बनाती हैं. वहां वे बेहतर सैलरी पाती हैं और अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करती हैं. यह सिलसिला तब तक चलता है, जब तक कि अमेरिका जाने के लिए उनकी वीजा की बारी (प्रायोरिटी डेट) नहीं आ जाती.

अमेरिकी इमिग्रेशन अटॉर्नी राजकृष्ण एस. अय्यर का कहना है कि वीजा मिलने में होने वाली लंबी देरी के बावजूद, बहुत सी भारतीय नर्सों के लिए आखिरी मंजिल आज भी अमेरिका ही है.

गरीब देशों से नर्सें भर्ती कर रहे हैं धनी देशः रिपोर्ट

अय्यर ने डीडब्ल्यू को बताया, “कई नर्सें अभी भी अमेरिका में काम करने की इच्छा रखती हैं. लेकिन बैकलॉग इतना ज्यादा है कि उन्हें अक्सर मौका मिलने से पहले कई साल दूसरी जगहों पर काम करना पड़ता है.”

वह आगे बताते हैं, “तब तक, परिवार के हालात बदल सकते हैं. इससे उन्हें अपनी योजनाओं पर दोबारा सोचना पड़ सकता है. कुछ लोग रिक्रूटमेंट एजेंटों पर निर्भर रहते हैं, जो हमेशा पूरी जानकारी नहीं देते.”

एंसी फिलिप इस पूरे सफर को बहुत अच्छी तरह समझती हैं. उनका जन्म भी केरल में हुआ था और वह 2006 में कैलिफोर्निया चली गई थीं. उस समय वहां के अस्पताल विदेशी नर्सों की बहुत बड़े पैमाने पर और तेजी से भर्ती कर रहे थे. लगभग दो दशक बाद, आज वह अमेरिकी नागरिक हैं और अब भी अमेरिकी अस्पताल में काम कर रही हैं.

उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, “जब मैं यहां आई थी, तो प्रक्रिया बहुत आसान थी. आज भी बुजुर्गों की बढ़ती आबादी के कारण नर्सों की भारी कमी है, लेकिन इमिग्रेशन बैकलॉग ने प्रक्रिया को बहुत मुश्किल बना दिया है. नर्सें अभी भी आ रही हैं, लेकिन पहले की तुलना में उनकी संख्या बहुत कम है.”

इसके बावजूद, उनका कहना है कि केरल की नर्सों की प्रतिष्ठा आज भी बहुत शानदार बनी हुई है. बतौर फिलिप, “वे अपने काम के प्रति समर्पित होती हैं, बेहद कुशल होती हैं, अपने काम की पूरी जिम्मेदारी लेती हैं और उनका व्यवहार पूरी तरह से प्रोफेशनल होता है. अस्पतालों को अच्छी तरह पता है कि वे किस बेहतरीन क्वालिटी के स्टाफ को अपने यहां रख रहे हैं.”

दुनिया भर में बन रही है भारतीय नर्सों की पहचान

नर्सिंग के क्षेत्र में केरल का यह दबदबा कई पीढ़ियों की मेहनत से बना है. इसे बनाने में मिशनरियों द्वारा चलाए गए कॉलेजों, अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा और विदेश जाने की एक लंबी परंपरा का बड़ा योगदान रहा है. आज केरल के कॉलेजों से पढ़े हुए युवा दुबई और लंदन से लेकर न्यूयॉर्क तक के अस्पतालों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

ट्रेन्ड नर्सेस एसोसिएशन ऑफ इंडिया के केरल चैप्टर की प्रेसिडेंट रेनू सुसान थॉमस ने डीडब्ल्यू को बताया, “भले ही इमिग्रेशन बैकलॉग के कारण विदेश जाने की रफ्तार धीमी हुई है, लेकिन मांग अभी भी बनी हुई है. इंडियन नर्सिंग काउंसिल का सिलेबस अमेरिका के नर्सिंग स्टैंडर्ड से काफी मिलता-जुलता है, जिससे क्रेडेंशियल का मूल्यांकन करना बहुत आसान हो जाता है.”

आंकड़े भी इस बात को सही साबित करते हैं. ‘माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट’ के मुताबिक, फिलीपींस के बाद भारत अमेरिका में रजिस्टर्ड नर्सों का दूसरा सबसे बड़ा जरिया है. इस संस्था का यह भी अनुमान है कि भारतीय मूल के लगभग 80,000 डॉक्टर अमेरिका में प्रैक्टिस (इलाज) कर रहे हैं. वहीं हेल्थकेयर वर्कफोर्स एजेंसी ‘स्पार्थ’ के मुताबिक, आज अमेरिका में भारतीय मूल की लगभग 32,000 नर्सें काम कर रही हैं. यह संख्या वहां काम करने वाली सभी विदेशी नर्सों का करीब 6 फीसदी है.

2024 में एनसीएलईएक्स परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों की संख्या के मामले में भी भारत दूसरे स्थान पर रहा, जिसमें 5,869 नर्सिंग ग्रेजुएट शामिल हुए. कोरोना महामारी के बाद से उनकी यह साख और भी ज्यादा मजबूत हुई है, क्योंकि इस महामारी ने दुनिया भर में स्वास्थ्य कर्मियों की भारी कमी को सबके सामने उजागर कर दिया.

ऑर्थोपेडिक सर्जन (हड्डी रोग विशेषज्ञ) धनंजय गुप्ता ने डीडब्ल्यू को बताया, “अस्पताल अपने नर्सिंग स्टाफ को ट्रेनिंग देने पर बहुत ज्यादा खर्च करते हैं, लेकिन अनुभवी नर्सों को अपने यहां रोक कर रखना एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुका है, क्योंकि उनमें से ज्यादातर नर्सें विदेश में बेहतर अवसरों के लिए काम छोड़ रही हैं. एक अनुभवी स्क्रब नर्स जो ऑपरेशन के दौरान डॉक्टर की मदद करती है, वह मेडिकल टीम का एक बेहद जरूरी हिस्सा होती है और रातों-रात उसकी जगह किसी और को नहीं रखा जा सकता.”

Manoj Mishra

Editor in Chief

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button