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रसोई में फिर से लौट रहे पीतल-तांबे के पारंपरिक बर्तन, औषधीय गुणों से होते हैं भरपूर

आजकल स्टील के बर्तनों के चलन में, आयुर्वेद हमें धातु के बर्तनों की ओर लौटने की प्रेरणा दे रहा है। सोने के बर्तन इम्युनिटी बढ़ाते हैं, चांदी पित्त के लिए अच्छी है, और मिट्टी के बर्तन सुरक्षित विकल्प हैं। तांबे के बर्तन गैस और कब्ज दूर करते हैं, जबकि पीतल रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। कांसे और लोहे के भी अपने औषधीय गुण हैं। धातु के बर्तन स्वास्थ्य और परंपरा दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।पटना। वर्तमान समय में जहां स्टील, प्लास्टिक और कांच के बर्तनों का उपयोग बढ़ गया है, वहीं आयुर्वेद फिर से हमें हमारे पारंपरिक धातु बर्तनों की ओर लौटने की प्रेरणा दे रहा है। राजकीय आयुर्वेद कॉलेज के काय चिकित्सा (मेडिसीन) विभाग के वरीय प्राध्यापक डॉ. अमरेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि प्राचीन काल में राजा-महाराजा जिन सोने-चांदी के बर्तनों का उपयोग करते थे, वह केवल ऐश्वर्य का प्रतीक नहीं था, बल्कि स्वास्थ्य संरक्षण का एक माध्यम भी था।

उन्होंने कहा कि सोना शरीर की इम्युनिटी यानी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में सहायक है। यह शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और मानसिक संतुलन बनाए रखता है।

चांदी के बर्तन पित्त प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों के लिए अत्यंत लाभकारी माने गए हैं। चांदी के बर्तनों में खाना खाने से शरीर में ठंडक बनी रहती है और यह त्वचा संबंधी रोगों से बचाव करता है।

मिट्टी के बर्तनों का महत्व

राजकीय आयुर्वेद कॉलेज के डॉ. रमण रंजन का कहना है कि मिट्टी के बर्तन आज भी सबसे सुरक्षित और प्राकृतिक विकल्प हैं। मिट्टी में बने भोजन में पृथ्वी तत्व का संचार होता है, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखता है। यह न केवल स्वाद को बढ़ाता है बल्कि भोजन को विषमुक्त भी बनाता है।

तांबा और पीतल के बर्तनों के गुण

आयुर्वेद में तांबे के बर्तन को विशेष स्थान दिया गया है। तांबे के बर्तन में रातभर रखा गया पानी सुबह खाली पेट पीना अत्यंत लाभदायक माना गया है। इससे गैस, अपच और कब्ज की समस्या दूर होती है।

तांबे में एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं, जो शरीर को संक्रमणों से बचाते हैं। पीतल के बर्तन में रखा पानी पीने से रोग-प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और शरीर में ऊर्जा का संचार होता है। पीतल के बर्तन में पका भोजन पाचन तंत्र को दुरुस्त करता है और शरीर में स्फूर्ति लाता है।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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