एक समय आत्महत्या का विचार आया, लेकिन बेटे के एक सवाल ने जिंदगी बदल दी। इसके बाद उदय कुमार ने दुनिया की ऊंची चोटियों पर तिरंगा फहराकर देश का सर्वोच्च साहसिक सम्मान हासिल किया। फिर भी आज वह सम्मानजनक नौकरी के इंतजार में हैं और परिवार पालने के लिए स्विगी-जोमैटो में डिलीवरी तथा रैपिडो चलाने का काम कर रहे हैं। जनसत्ता से खास बातचीत में उन्होंने अपनी संघर्षभरी यात्रा साझा की।जिस शख्स ने दुनिया की ऊंची चोटियों पर भारत का तिरंगा फहराकर देश का मान बढ़ाया, जिसे साहस के लिए तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार (देश का सर्वोच्च साहसिक पुरस्कार) से सम्मानित किया गया, आज वही अपने परिवार का पेट पालने के लिए स्विगी-जोमैटो में डिलीवरी करता है और रैपिडो चलाता है। साल 2015 में एक ट्रेन हादसे में पैर गंवाने के बाद उदय कुमार की जिंदगी कई बार बिखरी।
उदय कुमार को कभी लगा कि अब जीने का कोई मतलब नहीं बचा, लेकिन तीन साल के बेटे के एक मासूम सवाल- ‘पापा, झूला क्यों लगा रहे हैं?’ ने उन्हें मौत के मुहाने से खींच लिया। उसी दिन उन्होंने भविष्य में कभी भी हार न मानने की कसम खाई। उन्होंने अपने टूटे हुए सपनों को फिर से जोड़ा, दुनिया की ऊंची चोटियों पर तिरंगा लहराया।
हालांकि विडंबना देखिए उदय कुमार ने तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार तक का सफर तो तय कर लिया, लेकिन देश के सर्वोच्च खेल सम्मानों में से एक पाने के बाद भी उन्हें सम्मानजनक नौकरी नहीं मिली। जनसत्ता से खास बातचीत में दिव्यांग पर्वतारोही उदय कुमार ने अपनी जिंदगी के इन दर्दनाक और प्रेरक पलों को साझा किया।
सवाल: कैसे, कब और क्या हुआ?
- उदय कुमार: मेरी जर्नी स्टार्ट होती है 19 अक्टूबर 2015 को। नॉर्मल लाइफ से चलते-चलते चैलेंजिंग लाइफ में कनवर्ट होना। मैं बिहार के छपरा से कोलकाता के लिए सफर कर रहा था। जैसे ही मेरा डेस्टिनेशन आने वाला था। वह 2015 का साल था।
- मतलब उतना स्वच्छ कुछ था नहीं, ट्रेन में बेसिन वगैरह। मैं जैसे ही बेसिन पर गया, देखा वह पूरा पानी से लबालब भरा हुआ था और उसका पाइप जाम लग रहा था। ट्रेन चल रही थी तो पानी छलककर नीचे फैला हुआ था। ट्रेन चल रही थी तो मैंने मुंह धोने का सोचा।
- जैसे ही हाथ में पानी लेकर चेहरे पर मारा, तभी एक जर्क आया और मैं शरीर का संतुलन बना नहीं पाया। पैर फिसला मैं बाहर गिरा। चूंकि ट्रेन रनिंग थी और मैंने मैंने रॉड को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन तब तक प्लेटफॉर्म आ गया और ट्रेन और प्लेटफॉर्म के बीच में मेरा पैर फंस गया।
- ट्रेन चलती रही और पैर पूरा प्लेटफॉर्म में लगकर खराब हो गया। फिर जब प्लेटफॉर्म पर ट्रेन रुकी तो मैं हाथ छोड़ा तो गिर पड़ा और एक पत्थर स्पाइनल में घुस गया। जैसे तैसे फिर से खड़ा हुआ, लेकिन पैर तो था नहीं कि खड़ा हो पाता, इसलिए फिर गिर पड़ा। फिर एक पत्थर सिर में घुस गया।
- फिर हाथों के बल मैं प्लेटफॉर्म तक पहुंचा। चिल्लाया बचाओ मुझे हॉस्पिटल ले चलो। तभी 3-4 जवान लड़के मेरे पास आये। मुझे लगा कि मेरी मदद करेंगे, लेकिन उन्होंने पर्स, मोबाइल सब कुछ निकाल लिया। जेब खंगाली और जो भी था वह सब लेकर भाग गए।
- उदय कुमार: फिर जैसे तैसे खुद को संभाला, बेहोश हो गया था। होश में आया तो पास एक फैमिली के कुछ लोग थे। उन्होंने पूछा कि कहां रहते हो, क्या करते और सब विस्तार से बताया। फिर उन्होंने मेरे घर पर फोन किया और मेरे ऑफिस में फोन किया।
- उस समय मैं एक निजी कंपनी में कॉन्ट्रैक्चुअल लेबर के तौर पर काम करता था। वहां से फिर एम्बुलेंस और सिक्योरिटी गार्ड आकर रेसक्यू किया और हॉस्पिटल में ले जाकर पैर काट दिया गया। फिर जैसे तैसे खुद को संभाला। अस्पताल से घर आया।
- शरीर से लगभग पूरा खून तो निकल ही चुका था। आप समझ सकते हैं एक दिन में 4-5 अस्पतालों में ले जाया जाना और 6-7 बार ऑपरेशन होना कितना दुखद था। मैं घर पर था एक दिन पत्नी ने बोला कि बिस्तर पर थोड़ा खड़े हो जाइए।
- खाना हो चुका था। मैं शरीर को बैलेंस नहीं कर पाया, क्योंकि मेरे दाहिने पैर में सिर्फ अंगुलियां हैं और उनमें से सिर्फ तीन ही काम करती हैं। एक टेढ़ी हो गई है। …तो बैलेंस नहीं कर पाया अपने शरीर को और अपने बेटे के हाथ पर गिर गया।
- उदय कुमार: मेरे गिरने से बेटे का हाथ बीच से टूट गया। सामने मेरी मां बैठी हुई थी। मां यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाई। सोचिए मैं इकलौता लड़का, मेरा इकलौता लड़का। मां को सबकुछ बिखरते हुए लगा। उन्हें हार्ट अटैक आ गया। वह बड़ा हृदयविदारक दृश्य था।
- मेरे बेट का हाथ टूटा हुआ है। मेरा पैर कटा हुआ है। मां को हार्ट अटैक आ गया है। सामान्यतया किसी के भी परिवार में ऐसा हो तो सदम ही लगेगा। जैसे-तैसे मां को उस रात अस्पताल पहुंचाया, बेटे को अस्पताल पहुंचाया। उस दिन मुझे लगा कि लोग सही कहते हैं मुझे जीना नहीं चाहिए।
- मुझे मर जाना चाहिए। मैं परिवार के ऊपर बोझ हूं। ये सारी चीजें देखकर… मतलब मैंने प्लान किया कि मैं अब नहीं जीऊंगा। मैं खुद को खत्म कर लूंगा। दो-चार दिन बाद मम्मी और बेटा अस्पताल से घर आ चुके थे और फिर एक शाम पत्नी बोली कि मैं बाजार जा रही हूं, अपना ख्याल रखिएगा।
- मैंने सोचा कि यही अच्छा टाइम है खुद को खत्म करने का। मैंने घर में नायलोन की रस्सी खोजी और जैसे-तैसे हैंगिंग किया। गर्दन में लगा कर जैसे ही झूलने वाला था। तब तक मेरा तीन साल का बेटा, उसके हाथ में प्लास्टर बंधा हुआ था, मेरे सामने खड़ा था। वह बोला- ‘पापा झूला क्यों लगा रहे हैं?’
- उदय कुमार: उसके शब्दों ने मुझे इतना तोड़ दिया कि मैंने खुद को रस्सी से अलग किया और बच्चे से लिपटकर रोने लगा। उसी समय अचानक मेरे पापा का चेहरा, मेरे जीजाजी का चेहरा सामने आने लगा, क्योंकि पापा का देहांत 2013 में हो चुका था। मेरे जीजाजी का देहांत 2012 में हो चुका था।
- मैं हर कठिन परिस्थितियों को देख चुका था कि पिता के न होने की वजह से कितनी तकलीफ होती है। मम्मी को कितना दर्द है। दीदी पर क्या बीतती है। भांजे पर क्या गुजरती है। मैंने सोचा कि मैं वही सब चीजें अपने भांजे, अपने बेटे, बेटियों को देने जा रहा हूं, पत्नी को देने जा रहा हूं।
- उस दिन मैंने खुद से वादा किया कि चाहे कितनी भी कठिन परिस्थिति आ जाए, खुद को टूटने नहीं दूंगा, बिखरने नहीं दूंगा। एक ऐसी कहानी लिखूंगा कि कोई भी जनरेशन का शख्स आत्महत्या या कुछ भी गलत कदम उठाने से पहले 10 बार सोचेगा। जो भी मेरी कहानी पढ़ेंगे। वे नई शुरुआत करेंगे।
- उदय कुमार: इसके बाद मैंने एक टूल के सहारे, एक मैराथन के सहारे अपनी जिंदगी की नई शुरुआत की। माउंटेनिंग फील्ड में गया। तब तक कोविड आ चुका था। सारी दुनिया, सब कुछ सन्न, सब कुछ खत्म। बहुत मेहनत से मैंने खुद को दोबारा ‘खड़ा’ किया था।
- कोविड के दौरान प्रधानमंत्रीजी की एक स्पीच आती है कि ‘आपदा में अवसर का विस्तार’ करिए। आप घर में हैं तो यह नहीं कि सब कुछ खत्म हो गया है। कहीं से भी शुरुआत हो सकती है। इस पंक्ति ने मुझे इतना मोटिवेट किया कि मुझे लगा कि शायद प्रधानमंत्रीजी मुझे ही बोल रहे हैं।
- उदय कुमार: मैंने सोचा कि क्या मैं अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना सकता हूं। सोचा कि पैर नहीं है तो क्या हुआ, मैं बिना पैर के ही पहाड़ों की चढ़ाई करूंगा। तब मैंने ‘हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट’ (HMI), दार्जिलिंग के तत्कालीन प्रधानाचार्य (प्रिंसिपल) सर से ईमेल के माध्यम से संपर्क किया।
- जब सर से बात हुई तो उन्होंने बताया कि बेसिक माउंटेनियरिंग कोर्स के लिए 50 से 55 हजार रुपये का खर्च आता है। आप फीस जमा करके आ जाइए। मैंने सर को अपनी लाचारी बताते हुए लिखा कि मैं रोजाना सिर्फ 200-250 रुपये कमाने वाला इंसान हूं। मैं खुद क्या खाऊंगा, बच्चों को क्या खिलाऊंगा और इतनी बड़ी रकम कहां से भरूंगा? रहने दीजिए सर, यह मुझसे नहीं हो पाएगा।
- तब प्रिंसिपल सर ने मुझसे कहा कि ठीक है, एक बार आकर मिलो, कुछ रास्ता निकालते हैं। मैं अगले ही दिन उनसे मिलने दार्जिलिंग स्थित हिमालय पर्वतारोहण संस्थान पहुंच गया। सर ने मेरी परिस्थिति को देखते हुए सबसे पहले मेरी हिम्मत बढ़ाई। उन्होंने मुझे समझाया कि पर्वतारोहण केवल शारीरिक फिटनेस का नहीं, बल्कि मजबूत मानसिकता का खेल है। उन्होंने कहा कि अगर आप यहां तक आए हो तो परमात्मा ने जरूर कुछ सोचा होगा। काम मुश्किल है, लेकिन हम सब मिलकर प्रयास जरूर करेंगे।





