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रात को जुगनू की तरह चमकते हैं बालाघाट के जंगल, कुदरत के सीक्रेट खजाने को बटोरने जुटे ग्रामीण

बालाघाट:क्या आपने कभी आधी रात को जंगलों को रोशनी से नहाया हुआ देखा है. मध्य प्रदेश के बालाघाट के जंगलों में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है. सघन वन रात्रि में टिमटिमाती रोशनी से सराबोर नजर आ रहें हैं. घने जंगलों में दूर-दूर तक चारों तरफ न केवल प्रकाश की जगमगाहट बल्कि ग्रामीणों का हुजूम भी दिखाई पड़ रहा है. दरअसल, यह कोई उत्सव नहीं, बल्कि कुदरत के एक खास खजाने को समेटने की होड़ है. मानसून की पहली फुहार के साथ ही वनांचल के आदिवासी परिवार बिना किसी डर के रात भर जंगल छान रहे हैं.

पेड़ों से गिर रहा खजाना, समेटने में जुटे ग्रामीण
दरअसल ऐसा नजारा इन दिनों इसलिये नजर आ रहा है, क्योंकि यहां कुदरत का खजाना बरस रहा है. वे महुआ के पेड़ से गिरने वाले कीमती फल गुल्ली को इकट्ठा करने में जुटे हैं, जो बारिश के दिनों में उनकी आजीविका और राशन का सबसे बड़ा सहारा बनता है. इन वनांचल क्षेत्रों में निवासरत ग्रामीण शाम ढलते ही जंगलों की ओर कूच कर जाते हैं. हाथों में टॉर्च लिए बगल में थैला लटकाये न केवल पुरूष बल्कि महिलाएं और बच्चे तक इस होड़ में शामिल नजर आते हैं. पूरे जंगल को बिना किसी भय के रात्रि में छान मारते हैं. आईये ईटीवी भारत पर आपको इसकी पूरी कहानी बताते हैं.

आदिवासियों की आय का साधन है महुआ का फल
दरअसल वनांचल क्षेत्र के ग्रामीण इन दिनों महुआ के पेड़ों पर फलने वाली गुल्ली चुनने में व्यस्त नजर आ रहें हैं. चूंकि महुआ एक फूल है, जिसका पहले आदिवासी अंचल के लोग संग्रहण करते हैं, जो एक अच्छी खासी आय का उनके लिए जरिया है. महुआ के फूल झड़ने के बाद उसमें गुल्ली का फल लगता है. इन दिनों गुल्ली का फल पककर भारी मात्रा में पेड़ों के नीचे बरस रहा है, जिसे लोग रात्रि में समेट रहे हैं. यह गुल्ली भी उनके लिए आय का एक स्त्रोत है, जिसे बेचकर कुछ लोग अपने लिए बारिश की राशन सामग्री का जुगाड़ कर लेते हैं, तो वनांचल क्षेत्र के कुछ लोग इस गुल्ली का तेल निकालकर खाने के उपयोग में लेते हैं.रात में इसलिए करते हैं गुल्ली का कलेक्शन
आपको बता दें कि, गर्मी के सीजन में गुल्ली के फल लगते हैं, और पहली बारिश के साथ ही पककर पेड़ों के नीचे गिरने लगते हैं. इसके साथ ही लोग अक्सर रात्रि में इसका संग्रहण करने झुण्ड में निकल पड़ते हैं. उसका खास कारण है कि रात्रि में चमगादड़ इन पेड़ों पर बैठते हैं और पकी हुई गुल्ली का उपरी हिस्सा खाकर गुल्ली को नीचे गिराते जाते हैं, इसलिये रात्रि में लोग इसका संग्रहण अधिक करते हैं. हालांकि दिन में भी इसका संग्रहण किया जाता है. लेकिन सबसे अधिक संग्रहण इसका देर रात तक किया जाता है.आदिवासियों की आय का साधन है महुआ का फल
दरअसल वनांचल क्षेत्र के ग्रामीण इन दिनों महुआ के पेड़ों पर फलने वाली गुल्ली चुनने में व्यस्त नजर आ रहें हैं. चूंकि महुआ एक फूल है, जिसका पहले आदिवासी अंचल के लोग संग्रहण करते हैं, जो एक अच्छी खासी आय का उनके लिए जरिया है. महुआ के फूल झड़ने के बाद उसमें गुल्ली का फल लगता है. इन दिनों गुल्ली का फल पककर भारी मात्रा में पेड़ों के नीचे बरस रहा है, जिसे लोग रात्रि में समेट रहे हैं. यह गुल्ली भी उनके लिए आय का एक स्त्रोत है, जिसे बेचकर कुछ लोग अपने लिए बारिश की राशन सामग्री का जुगाड़ कर लेते हैं, तो वनांचल क्षेत्र के कुछ लोग इस गुल्ली का तेल निकालकर खाने के उपयोग में लेते हैं.रात में इसलिए करते हैं गुल्ली का कलेक्शन
आपको बता दें कि, गर्मी के सीजन में गुल्ली के फल लगते हैं, और पहली बारिश के साथ ही पककर पेड़ों के नीचे गिरने लगते हैं. इसके साथ ही लोग अक्सर रात्रि में इसका संग्रहण करने झुण्ड में निकल पड़ते हैं. उसका खास कारण है कि रात्रि में चमगादड़ इन पेड़ों पर बैठते हैं और पकी हुई गुल्ली का उपरी हिस्सा खाकर गुल्ली को नीचे गिराते जाते हैं, इसलिये रात्रि में लोग इसका संग्रहण अधिक करते हैं. हालांकि दिन में भी इसका संग्रहण किया जाता है. लेकिन सबसे अधिक संग्रहण इसका देर रात तक किया जाता है.

 

Manoj Mishra

Editor in Chief

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