नई दिल्ली। साल 2009 में आई फिल्म दिल्ली-6 का गाना ससुराल गेंदा फूल तो आपने सुना ही होगा। रेखा भारद्वाज की आवाज में गाया गया ये गाना दर्शकों को खूब पसंद आया था और आज भी शादी-ब्याह के मौकों पर खूब बजता है। आमतौर पर लोग इस गाने को बॉलीवुड का सिर्फ एक हिट सॉन्ग समझते हैं, लेकिन ये गाना सालों पुराना है और छत्तीसगढ़ी लोकगीत से खास ताल्लुक रखता है। आइए जानें इस गाने का छत्तीसगढ़ के लोकगीत से क्या नाता है
थियेटर से सिनेमा हॉल तक
यूं तो ये गाना छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकधुनों का हिस्सा रहा है, लेकिन इस गाने को पहचान 1970 के दशक में मिली। इस गीत को मूल रूप से गंगाराम शिवारे ने लिखा था और इसकी धुन भुलवाराम यादव ने तैयार की थी। बाद में भुलवाराम ने ये गीत जोशी सिस्टर्स (रमा, रेखा और प्रभा जोशी) को सिखाया, जिन्होंने इसे सार्वजनिक मंचों और रेडियो पर गाना शुरू किया और यह गीत घर-घर में मशहूर हो गया। इसके बाद यह गाना पद्मश्री हबीब तनवीर के थिएटर नया थिएटर में भी प्रस्तुत किया गया, जो अक्सर छत्तीसगढ़ के को अपने नाटकों में शामिल किया करते थे। इसके बाद जब फिल्म दिल्ली-6 बन रही थी, तब अभिनेता और गायक रघुवीर यादव ने यह गीत को सुनाया और प्रसून जोशी ने इस गीत के लिरिक्स में बदलाव किए। इस तरह हमें मिला बॉलीवुड का मशहूर गाना ससुराल गेंदा फूल।
ससुराल गेंदा फूल को ददरिया शैली में गाया गया है। ददरिया को छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का राजा कहा जाता है। यह संवाद की तरह गाया जाता है, जिसमें पुरुष और महिला पक्ष गानों के जरिए एक-दूसरे को ताने मारते हैं या प्यार जताते हैं। ददरिया शैली की सबसे बड़ी खूबी है इसके दोहेनुमा छोटे बोल, जो लोगों के दिल में बस जाते हैं।
शादियों की है पहली पसंद
ससुराल गेंदा फूल गाने में एक महिला अपने नए घर यानी ससुराल के अनुभवों और वहां के रिश्तों को बयां कर रही है। इसके छत्तीसगढ़ी बोल हैं- सास गारी देवे, ननद मुहां लेवे, देवार बाबू मोर… वहीं इसका बॉलीवुड वर्जन है- सास गारी देवे, देवर जी समझा लेवे…।
इस गाने के जरिए महिला नए घर में आने वाली खट्टी-मीठी नोक-झोंक और इंसानी रिश्तों के संतुलन को बेहद खूबसूरती और हल्के-फुल्के अंदाज में बयां कर रही है। इसलिए शादियों में इस गाने को खूब पसंद किया जाता है





