सुकमा:कभी नक्सलियों की बंदूक और बारूदी सुरंगों की दहशत से कांपने वाला मोरपल्ली गांव अब बदलाव की नई कहानी लिखने की कोशिश कर रहा है. घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों के बीच बसे इस गांव में पहली बार केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) का सिविक एक्शन प्रोग्राम पहुंचा तो ग्रामीणों की आंखों में वर्षों बाद उम्मीद की चमक दिखाई दी. यहां पहुंचकर जवानों ने बच्चों बुजुर्गों महिलाओं सभी वर्ग की ना सिर्फ समस्या सुनी बल्कि सहायता के साथ जरूरी सामान पहुंचाने की भी कोशिश की.
बरसात के समय तो पहुंचाना नामुमकिन जैसा
13 किलोमीटर भीतर जंगलों के बीच स्थित मोरपल्ली तक पहुंचना आज भी आसान नहीं है. गांव तक जाने के लिए न कोई पक्की सड़क है और न ही परिवहन की कोई सुविधा. बरसात के दिनों में यहां पहुंचना लगभग असंभव हो जाता है. यही वजह रही कि वर्षों तक यह गांव नक्सल प्रभाव के कारण देश-दुनिया से लगभग कटा रहा. पहले तो कई बार जवानों को बारूदी सुरंगों, घात लगाकर किए गए हमलों और नक्सली हिंसा का सामना भी करना पड़ा.
मोरपल्ली उन्हीं इलाकों में शामिल रहा है जहां कभी नक्सलियों का प्रभाव इतना अधिक था कि ग्रामीण खुलकर अपनी समस्याएं तक नहीं बता पाते थे. गांव में विकास की बात करना भी डर के साये में जीने जैसा था. रात होते ही पूरा इलाका सन्नाटे में डूब जाता था और लोगों की जिंदगी भय के बीच गुजरती थी. लेकिन अब हालात धीरे-धीरे बदलने लगे हैं.
जरूरत का सामान वितरित किया गया
14 मई 2026 को सीआरपीएफ की 74वीं वाहिनी के जवान इस गांव तक पहुंचे. 74 वाहिनी के कमांडेंट हिमांशु पाण्डे के निर्देश पर आयोजित सिविक एक्शन प्रोग्राम में सहायक कमांडेंट सुमन सोरम एवं थाना प्रभारी चिंतनलार इंस्पेक्टर अमोल खलको विशेष रूप से मौजूद रहे. कार्यक्रम के दौरान गांव और आसपास के क्षेत्रों से पहुंचे लगभग 200 से अधिक ग्रामीणों को जरूरत का सामान वितरित किया गया.महिलाओं को साड़ी, पुरुषों को लुंगी, जरूरतमंद परिवारों को बर्तन, चप्पल, छाता, मच्छरदानी और सोलर लाइट दी गई. बच्चों के चेहरे उस समय खिल उठे जब उन्हें फुटबाल, वालीबाल, क्रिकेट किट और अन्य खेल सामग्री दी गई. कई बच्चों ने शायद पहली बार अपने हाथों में क्रिकेट बैट और फुटबाल पकड़ी थी. यह केवल राहत सामग्री का वितरण नहीं था, बल्कि भरोसे और संबंधों को मजबूत करने की एक कोशिश थी.
ग्रामीणों ने की सराहना, समस्याएं भी बताई
कार्यक्रम के दौरान बुजुर्ग ग्रामीणों ने जवानों का हाथ पकड़कर कहा कि उनके गांव में पहली बार कोई इस तरह मदद लेकर पहुंचा है. कई ग्रामीणों ने बताया कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी गांव में बिजली, सड़क और शुद्ध पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं पूरी तरह नहीं पहुंच पाई हैं. बीमार पड़ने पर लोगों को घंटों पैदल चलकर अस्पताल तक पहुंचना पड़ता है. गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के लिए यह रास्ता किसी परीक्षा से कम नहीं होता.
ग्रामीणों ने अधिकारियों के सामने गांव में सड़क निर्माण, बिजली, पानी, स्वास्थ्य सुविधा और बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कूल जैसी मूलभूत जरूरतों की मांग रखी. ग्रामीणों की बातों में वर्षों का दर्द साफ झलक रहा था. वे अब डर और हिंसा से बाहर निकलकर सामान्य जिंदगी जीना चाहते हैं.
नक्सलवाद भी गांव के पिछड़ने की वजह
इस दौरान कई ग्रामीणों ने यह भी स्वीकार किया कि नक्सलवाद ने उनके गांव की एक पूरी पीढ़ी को विकास से दूर कर दिया. जहां दूसरे गांव आगे बढ़ते गए, वहीं मोरपल्ली जंगलों में कैद होकर रह गया. यहां के बच्चे शिक्षा से दूर रहे, युवा रोजगार से और बुजुर्ग स्वास्थ्य सुविधाओं से. लेकिन अब गांव के लोग बदलाव चाहते हैं. सीआरपीएफ और पुलिस के जवानों ने भी कठिन परिस्थितियों के बावजूद गांव तक पहुंचकर यह संदेश देने की कोशिश की कि सरकार अब गांवों को अकेला नहीं छोड़ेगी.
ग्रामीणों ने कहा कि अब वे क्षेत्र में शांति बनाए रखने और नक्सल समस्या को पूरी तरह खत्म करने में पुलिस और सीआरपीएफ का सहयोग करेंगे. अंत में सहायक कमांडेंट सुमन सोरम ने ग्रामीणों को संबोधित करते हुए कहा कि सुरक्षा बल केवल सुरक्षा देने का कार्य नहीं कर रहे, बल्कि गांवों तक विश्वास और विकास पहुंचाने का भी प्रयास कर रहे हैं.





