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कक्षा 9 में ही छोड़ दिया था स्कूल, हर्षिता ने कैसे तय किया सहारनपुर से सिलिकॉन वैली तक का सफर, दिलचस्प है कहानी

यह कहानी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की रहने वाली 24 साल की उद्यमी हर्षिता अरोरा की है। जिसने सहारनपुर से सिलिकॉन वैली का तक का सफर तय किया। हर्षिता को सिलिकॉन वैली के सबसे प्रभावशाली स्टार्टअप एक्सेलरेटर में से एक वाई कॉम्बिनेटर (वाईसी) में सबसे कम उम्र की जनरल पार्टनर नामित किया गया है।

हर्षिता की नियुक्ति वाईसी के साथ एक विजिटिंग पार्टनर के रूप में काम करने के एक साल से भी कम समय के भीतर हुई है, जहां उन्होंने ग्रीष्मकालीन 2025 बैच के दौरान शुरुआती चरण के संस्थापकों को मार्गदर्शन दिया था। अपनी नई भूमिका में अरोरा विभिन्न चरणों में स्टार्टअप्स के साथ काम करेंगी, जिससे उन्हें अपने व्यवसायों को बनाने और बढ़ाने में मदद मिलेगी।

हर्षिता अरोरा जब 15 साल की थी तो वो लैपटॉप से चिपकी रहती थी। उन्होंंने स्कूल जाना बंद कर दिया था। पारिवारिक समारोहों में शामिल होने, यात्राओं पर जाने से इनकार कर दिया था और यहां तक ​​कि अपने दादा-दादी के घर भी नहीं जाती थी, लेकिन कई वर्षों बाद, घंटों स्क्रीन के पीछे समय बिताकर अपने कमरे में उसने जो कुछ बनाया, वही उसे सिलिकॉन वैली तक ले जाएगा।हर्षिता अब 24 साल की हैं। वह वाई कॉम्बिनेटर में सबसे कम उम्र की जनरल पार्टनर में से एक हैं, जो एक प्रतिष्ठित स्टार्टअप एक्सेलेरेटर है जिसने दुनिया की कुछ सबसे प्रभावशाली प्रौद्योगिकी कंपनियों का समर्थन किया है।गूगल के सुंदर पिचाई या माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला जैसे भारतीय प्रौद्योगिकी जगत में बड़ी सफलता हासिल कर रहे हैं और ये नाम उन माता-पिता के लिए प्रेरणास्रोत बन गए हैं जो अपने बच्चों के लिए अमेरिकी सपनों को साकार करने का सपना देखते हैं। हालांकि, हर्षिता की यात्रा ने इन सभी रास्तों को फॉलो नहीं किया। जिसमें लोगों को ऊंचाई पर जाने के लिए स्कूल , डिग्री या अन्य कई तरह के रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। यही वजह है कि हर्षिता की यह कहानी उनको अन्य लोगों से अलग बनाती

जीवन बदलने वाला फैसला

हर्षिता का जन्म 2002 में रविंदर सिंह अरोरा और जसविंदर कौर अरोर के घर हुआ। अरोरा प्रॉपर्टी निवेश के क्षेत्र में काम करते हैं। जबकि हर्षिता की मां एक गृहणि हैं। हर्षिता अपने माता-पिता की इकलौती संतान हैं।

हर्षिता के पिता रविंदर कहते हैं कि हमारी बेटी सीधी-सादी और बहुत अच्छी छात्रा थी। वह हमेशा कक्षा में प्रथम आती थी। उसके शिक्षक उसकी पढ़ाई से बहुत खुश रहते थे। वो कहते हैं कि जब हर्षिता प्राथमिक विद्यालय में थी, तब एक शिक्षक ने उसकी मां से कहा था कि यह बच्ची कुछ अलग करेगी।

हालांकि, 2016 में एक एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। जब हर्षिता सहारनपुर के पाइनवुड स्कूल में कक्षा 9 में पढ़ रही थी। उनके पिता याद करते हुए बताते हैं कि उसने कहा कि वह अब स्कूल नहीं जाना चाहती। उसने हमें बताया कि वह पढ़ना नहीं चाहती। उसने कहा कि उसे कंप्यूटर में रुचि है।

परिवार का कहना है कि उसने शुरू में सभा के दौरान बेचैनी, चक्कर आना और कक्षाओं में असहजता की शिकायत की, जो जल्द ही पूरी तरह से इनकार में बदल गई। मां जसविंदर याद करते हुए कहती हैं कि उस दौरान हम बहुत तनाव में थे। यह बहुत ही अजीब स्थिति थी। रविंदर को याद है कि वह उस वक्त कितना परेशान थे, जब मेरी 15 साल की बच्ची ने कहा कि वह अब स्कूल नहीं जाना चाहती। कोई भी यह सुनकर चौंक जाएगा।

रविंदर कहते हैं कि उन्होंने अपनी बेटी से बात की और कहा कि कक्षा 10 तक पढ़ाई पूरी कर लीजिए, कुछ महीने पढ़ाई करो, लेकिन उसने कहा कि मैं एसएसटी, हिंदी, संस्कृत नहीं पढ़ना चाहती। अंत में बेटी की जिद के आगे माता-पिता को झुकना पड़ा। पिता रविंदर कहते हैं कि मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। वह मेरी बात नहीं सुनती थी।

वहीं, अब पीछे मुड़कर देखने पर हर्षिता कहती हैं कि वह क्षण विद्रोह नहीं बल्कि अस्वीकृति था। हर्षिता कहती हैं कि भारतीय स्कूलों में जो कुछ भी पढ़ाया जाता है, उसमें से अधिकांश रटने पर आधारित होता है। मुझे यह व्यर्थ लगा।

पिता रविंदर कहते हैं कि परिवार ने हर्षिता को घर पर पढ़ाने की व्यवस्था करने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे। रविंदर याद करते हुए कहते हैं कि वह अपने कमरे से बाहर कदम नहीं रखना चाहती थी। वह सचमुच खुद को अंदर बंद कर लेती थी। हम कुछ नहीं कर सकते थे। वह अपनी बात पर अड़ी रहती थी।

अपनी किशोरावस्था के शुरुआती दौर में हर्षिता ने प्रोग्रामिंग की खोज की। कंप्यूटर साइंस के एक शिक्षक ने उन्हें स्क्रैच और एमआईटी ऐप इन्वेंटर जैसे टूल्स से परिचित कराया और इसमे उसकी दिलचस्पी बढ़ गई। हर्षिता याद करते हुए कहती हैं कि मैंने 13 साल की उम्र में प्रोग्रामिंग शुरू की थी। मैंने पॉल ग्राहम के निबंध भी पढ़े, स्टार्टअप और कंपनियां बनाने पर उनके लेखन ने मेरी रचनात्मक भावना को प्रेरित किया। उन्होंने फेसबुक की स्थापना पर बनी लोकप्रिय बायोपिक ‘द सोशल नेटवर्क’ भी देखी। जिसने जीवन में मेरी आकांक्षाओं को बदल दिया।

कुछ समय बाद हर्षिता ने एक और योजना बनाई। रविंदर बताते हैं कि उसने हमसे कहा कि उसका बेंगलुरु में एक प्रोग्राम में चयन हो गया है और उसे वह कोर्स करने जाना है। हमने उसे जाने की अनुमति दे दी।

2016 में अगले कुछ महीनों के लिए हर्षिता ने बेंगलुरु में सेल्सफोर्स में एक महीने के प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया। जिससे उन्हें एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर वातावरण और डेवलपर इकोसिस्टम का अनुभव प्राप्त हुआ।

फिर 2017 में उनका चयन मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में आयोजित एक बेहद चुनिंदा उद्यमिता कार्यक्रम, लॉन्चएक्स के लिए हुआ। उनके पिता कहते हैं कि वह केवल लगभग 70 छात्रों का चयन करते हैं। फीस बहुत ज्यादा थी, लेकिन उन्हें वित्तीय सहायता मिली और हमने केवल लगभग 1,000 डॉलर का भुगतान किया। इस दौरान हर्षिता कुछ हफ्तों के लिए अमेरिका में विजिटर वीजा पर थी, जहां वह दुनिया भर के साथियों के साथ स्टार्टअप विचारों पर काम कर रही थी। पहली बार वह ऐसे माहौल में थी जो उस दुनिया को प्रतिबिंबित करता था जिसे वह ऑनलाइन अपने लिए बना रही थी।

उसी साल जब हर्षिता अगस्त में भारत लौटी तो घर में तनाव बना रहा। उसके पिता कहते हैं कि हमें अब भी समझ नहीं आ रहा था कि वह आगे क्या करेगी। कोई निश्चित रास्ता नहीं था।

रविंदर बताते हैं कि परिवार उनकी स्थिति को लेकर बेहद चिंतित था। वे कहते हैं कि मेरा जीवन बहुत सरल था। मेरे पिता वकील हैं, जो कर कानून का अभ्यास करते हैं, मेरा भाई भी वकील है और मैं संपत्ति में निवेश करता हूं। हमारा एक पारंपरिक मध्यमवर्गीय परिवार है और हमारा जीवन बहुत ही सरल रहा है।

अगले छह महीनों में हर्षिता फिर से अपने कमरे में सिमट गई और एक ऐसी जिंदगी जीने लगी जो जैसे अलग ही समय पर चल रही हो। वह कहती है कि मैं बाहर नहीं जाती थी। बस कोडिंग करती थी, पढ़ती थी और सीखती रहती थी। सब कुछ बहुत YOLO जैसा था। मेरे पापा बार-बार मुझसे कोई प्लान पूछते थे, और मैं कहती थी कि मेरे पास अभी कोई प्लान नहीं है, मैं खुद ही रास्ता ढूंढ लूंगी।

फिर फरवरी 2018 में रविंदर बताते हैं कि हर्षिता ने उनसे अगले दिन का अखबार देखने को कहा। उसने कहा कि उसमें उसके बारे में कुछ छपा है। उस समय तक उन्हें यह पता नहीं था कि वह क्या कर रही थी।

जब उन्होंने अखबार देखा, तो हैरान रह गए। हर्षिता ने एक ऐप बना लिया था, जो क्रिप्टोकरेंसी पोर्टफोलियो को ट्रैक करता था। वह ऐप एप्पल के ऐप स्टोर पर एक पेड प्रोडक्ट के रूप में मौजूद था और अपनी कैटेगरी में टॉप ऐप्स में शामिल था।

रविंदर कहते हैं कि मैं बिल्कुल हैरान रह गया। हर्षिता को आज भी उनका रिएक्शन याद है। वह कहती है कि उन्होंने कहा कि मैंने जितना सालों में कमाया, तुमने महीनों में बना लिया। उनका दिमाग चकरा गया था। बाद में उस ऐप को किसी कंपनी ने खरीद लिया।

हर्षिता के लिए खुलने लगे दरवाजे

उसी साल हर्षिता को कनाडा के टोरंटो में आयोजित क्रिप्टोचिक्स हैकाथॉन सम्मेलन में ‘वुमन ऑफ द ईयर’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने प्रौद्योगिकी, विज्ञान या व्यवसाय जैसे क्षेत्रों में असाधारण क्षमता रखने वाले व्यक्तियों को दिए जाने वाले ओ-1 वीजा के लिए भी आवेदन किया था और उन्हें यह वीजा जारी कर दिया गया था।

2019 में हर्षिता ने AtoB पर काम करना शुरू किया, जो एक फिनटेक और लॉजिस्टिक्स स्टार्टअप है जिसकी वह को-फाउंडेड हैं। जो ट्रकिंग उद्योग (Trucking Industry) के लिए ईंधन कार्ड और भुगतान पर केंद्रित है।

हर्षिता कहती हैं कि हालांकि, शुरुआती दिन अनिश्चित थे। हमारे पास स्टार्टअप का कोई विचार नहीं था हम बस यही सोच रहे थे कि हम क्या करने वाले हैं?

छह महीने तक वह और उसके दो सह-संस्थापक नए-नए आइडिया पर काम करते रहे। आखिरकार उन्हें ट्रकिंग पेमेंट और फ्लीट्स के लिए फाइनेंशियल सिस्टम बनाने में सफलता मिली। कंपनी तेजी से बढ़ी, हजारों ग्राहकों तक पहुंची और इसकी वैल्यू करीब 800 मिलियन डॉलर तक पहुंच गई।

हर्षिता को 2020 में क्रिप्टोकरेंसी ऐप पर उनके काम के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बाल पुरस्कार मिला। यह पुरस्कार प्राप्त करने के लिए वह भारत वापस आईं। फिर, 2021 में हर्षिता ने एक नई ऊंचाई हासिल हुई, AtoB को वाई कॉम्बिनेटर (Y Combinator) में फंडिंग के लिए चुन लिया गया। वह कहती हैं कि यह कोई निर्णायक मोड़ नहीं होता है। यह सिर्फ एक सोच की बात है। आपको हार न मानने का फैसला करना होता है।

हालांकि, सहारनपुर से हर्षिता के पिता रविंदर ने इस बदलाव को दूर देखा। वे स्वीकार करते हैं कि वह जो कुछ कहती है, उसका आधा हिस्सा मुझे समझ नहीं आता। लेकिन वह आगे बढ़ती रही। मुझे लगता है कि भगवान ने ही उसे रास्ता दिखाया।

वह कहते हैं कि 2020 के बाद, हम उससे 2024 में फिर मिले। उन्होंने महसूस किया कि इस दौरान क्या खो गया था। वो कहते हैं कि मुझे याद है कि जब वह बहुत छोटी थी, तो कैसे मेरी गोद में सिमटकर बैठ जाती थी। मेरे लिए, वह अभी भी एक बच्ची है। मैं उसका बचपन नहीं देख पाया। मुझे अपनी बेटी की यही बात सबसे ज़्यादा याद आती है। लेकिन मुझे उस पर बहुत गर्व है।

उसकी मां कहती है कि हम हर रोज बात नहीं करते। सिर्फ सप्ताह में एक बार ही बात करते हैं। जसविंदर को आज भी अपनी बेटी के लिए नाश्ता बनाने में बिताई शामें याद हैं। हर्षिता की मां कहती है कि वह दोपहर 3:30 बजे अपना लंच करती थी। और फिर 5:30 बजे तक वह कहती कि उसे फिर से भूख लग गई है। मैं कहती, ‘तुमने अभी-अभी तो खाया है!’ लेकिन फिर भी मैं उसके लिए मैकरोनी, सैंडविच, फ्राइज़, कटलेट बनाती थी… मुझे वे शामें बहुत याद आती हैं।

क्या हर्षिता को घर की याद आती है? इस सवाल पर उनकी मां कहती है नहीं, क्योंकि वह अपने काम को लेकर बहुत जुनूनी है।

मार्च 2025 हर्षिता के करियर में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि लेकर आया। उन्होंने वाई कॉम्बिनेटर में विजिटिंग पार्टनर के रूप में कार्यभार संभाला। फिर,इसी साल 6 अप्रैल को उसे जनरल पार्टनर के पद पर पदोन्नत किया गया।

हर्षिता अपनी इस कामयाबी को लेकर कहती हैं कि आप एक विजिटिंग पार्टनर के रूप में शुरुआत करते हैं। अगर आप अच्छा प्रदर्शन करते हैं, तो आपको पदोन्नति मिलती है।

वह कहती हैं कि अब उनकी भूमिका में शुरुआती चरण के फाउंडर की पहचान करना और उन्हें समर्थन देना शामिल है, और उनका काम का दिन आधी रात के बाद तक चलता है। हर्षिता कहती हैं कि उनके पास काम के अलावा कुछ खास नहीं है। मैं एआई के बारे में पढ़ती हूं और उपकरणों के साथ प्रयोग करती हूं। मुझे शौक करने में ज्यादा रुचि नहीं है।

युवाओं को सलाह क्या है? इस सवाल पर हर्षिता कहती हैं कि दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। अगर आप युवा हैं और कुछ बड़ा करना चाहते हैं, तो आपको हमेशा नई चीज़ों के साथ अपडेट रहना होगा। नहीं तो आप पीछे रह जाएंगे।

लेकिन वह अपनी राह को सबके लिए सही नहीं मानतीं और कॉलेज जाने की सलाह देती हैं।

वह कहती हैं कि मेरे लिए कॉलेज छोड़ना काम कर गया, लेकिन ज़्यादातर लोग अपने को-फाउंडर कॉलेज में ही ढूंढते हैं। कॉलेज आपको नई चीज़ें सीखने और समझने का समय देता है। मुझे ये सब खुद करना पड़ा। हैकर हाउस में रहकर और खुद पढ़कर। यह आसान नहीं होता। इसलिए ज्यादातर लोगों को कॉलेज जाना चाहिए। बहुत कम लोग ही इसे छोड़ सकते हैं। वह आगे कहती हैं कि मेरे पास कोई तय योजना नहीं थी, बस मुझे भरोसा था कि मैं रास्ता निकाल लूंगी।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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