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हाईस्कूल में फेल, मनरेगा में मजदूरी… संघर्षों से लड़कर 31 साल में बने प्रोफेसर, पढ़ें डॉ. रामकुमार कन्नौजिया कहानी

बलियाः गरीब परिवार में जन्मे रामकुमार के घर की हालत साधारण थी. पिता कपड़े धोकर किसी तरह परिवार चलाते थे और मां घर-गृहस्थी संभालती थीं. जिंदगी में सुविधाएं कम थीं, लेकिन सपने छोटे नहीं थे. साल 2008 में जब हाईस्कूल का रिजल्ट आया तो रामकुमार फेल हो गए. उस दिन उन्हें लगा जैसे सब कुछ खत्म हो गया हो. गांव के लोग ताने देने लगे. अब क्या करेगा? लेकिन उसी रात मिट्टी के घर में जलती ढिबरी की रोशनी के नीचे बैठे रामकुमार ने एक फैसला लिया कि अब हार नहीं माननी है. लोगों के तानों का जवाब देना है. फेल होना और गांव वालों का ताना रामकुमार के लिये सबसे बड़ा हथियार बन गया. आज वो अपने जीवन में सफल है. आइये जानते हैं इनकी सफलता की कहानी.बलिया के श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय के मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष डॉ. रामकुमार कन्नौजिया की कहानी आज के युवाओं के लिए बड़ी प्रेरणा है. महज 31 साल की उम्र में एसोसिएट प्रोफेसर बनने वाले डॉ. कन्नौजिया मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जिला बाराबंकी के ग्राम व पोस्ट मधवापुर के रहने वाले हैं. कक्षा 1 से लेकर PhD तक की पूरी पढ़ाई इन्होंने सिर्फ सरकारी स्कूल, कॉलेज, डिग्री कॉलेज और विश्वविद्यालयों से की है.घर का खर्च मुश्किल से चलता था
डॉ. कन्नौजिया बताते है कि साल 2008 में वह हाईस्कूल की परीक्षा में फेल हो गए थे और 2009 में दोबारा परीक्षा देकर पास हुए. इस असफलता के बाद उन्हें लगा कि अगर आगे भी पढ़ाई में असफल रहे तो या तो खेती-बाड़ी और घर के पारम्परिक कामों में लगना पड़ेगा या फिर बाहर कमाने जाना होगा. उनके पिता कपड़ा धोने का काम करते थे और घर का खर्च मुश्किल से चलता था. इसी हालात ने रामकुमार को यह संकल्प लेने पर मजबूर किया कि अब उन्हें कुछ बड़ा करना ही है.रात में ढिबरी की रोशनी में पढ़ाई
गांव में पशुओं की देखभाल और खेती-किसानी के बीच उन्होंने पढ़ाई का सिलसिला जारी रखा. सुबह 4 बजे उठकर 6 बजे तक और रात में ढिबरी की रोशनी में 9 से 9:30 बजे तक वह नियमित रूप से पढ़ते रहे. साल 2011 में उन्होंने राजकीय इंटर कॉलेज से इंटर की परीक्षा पास की और कक्षा में तीसरा स्थान हासिल किया.

तालाब खुदवाने और सड़क पाटने का काम किया
इसके बाद BA में दाखिले के लिए उन्होंने BHU में फॉर्म भरा. लेकिन चयन नहीं हुआ. फिर बाराबंकी छोड़कर गोंडा चले गए. यहां पढ़ाई के लिए उन्हें रोजाना दोनों तरफ मिलाकर 160 KM से अधिक दूरी तय करनी पड़ती थी. जिसमें 20 KM साइकिल और लगभग 140 KM ट्रेन से सफर शामिल था. इंटर और BA की फीस जुटाने के लिए उन्होंने मनरेगा के तहत तालाब खुदवाने और सड़क पाटने जैसे काम भी किए. ट्रेन लेट होने पर अक्सर देर रात घर पहुंचते थे.

घर से बस 1 हजार मिलता था महीने का खर्च
कुछ समय बाद उन्हें पता चला कि गोंडा में अनुसूचित जाति के लिए निःशुल्क छात्रावास है. परिचित राजकिशोर की मदद से उन्हें वहां कमरा मिल गया. छात्रावास में वह खुद खाना बनाकर रहते थे और अनाज-तेल घर से लेकर आते थे. घर से उन्हें महीने भर के लिए मात्र ₹1,000 मिलते थे, जिसमें से ₹500 कोचिंग फीस और बाकी ₹500 सब्जी आदि पर खर्च होते थे. स्टेशन से किराया बचाने के लिए भारी सामान भी वे खुद कंधे पर ढोते थे. उस समय उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि प्रोफेसर बनेंगे. उनका सपना सिर्फ प्रवक्ता बनने का था.

रोज 16 घंटे तक पढ़ाई की
गोंडा में प्रो. अमन चंद्रा, जो मध्यकालीन इतिहास के बड़े जानकार थे, से उन्हें शैक्षिक प्रेरणा मिली और हौसला और बढ़ा. इसके बाद MA में प्रवेश के लिए 2014 में उन्होंने JNU, AU और BHU की प्रवेश परीक्षाएं दीं. इनमें से AU और BHU में उनका चयन हुआ और उन्होंने BHU से MA किया. वह बताते हैं कि BA तक उन्होंने कभी ईमानदारी से 8 घंटे पढ़ाई नहीं की थी, लेकिन Net-JRF की तैयारी के दौरान BHU में उन्होंने रिकॉर्ड के तौर पर रोज 16 घंटे तक पढ़ाई की.

परीक्षा पास की मगर इंटरव्यू में चयन नहीं हुआ
M.Phil/Ph.D. में प्रवेश के लिए 2016-17 में उन्होंने JNU, DU, BBAU और BHU में आवेदन किया. सभी जगह लिखित परीक्षा तो पास कर ली, लेकिन इंटरव्यू के बाद चयन नहीं हो पाया. अंततः 2017 में BHU के इतिहास विभाग में Ph.D. में उनका एडमिशन हुआ और 2022 में उन्होंने Ph.D. पूरी कर ली. इस दौरान उन्हें जूनियर रिसर्च फेलोशिप के तहत ₹23-25 हजार प्रतिमाह स्कॉलरशिप भी मिलती रही.

असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर जॉइन किया
इसके बाद 29 जून 2022 को उन्होंने श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बलिया के इतिहास विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर जॉइन किया. डॉ. रामकुमार कन्नौजिया आज के युवाओं को संदेश देते हैं कि हर परिस्थिति में धैर्य बनाए रखें, असफलताओं से निराश न हों. सफलता जरूर मिलेगी, बस समय थोड़ा अधिक लग सकता है

Manoj Mishra

Editor in Chief

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