नई दिल्ली. भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. वह दौर अब पीछे छूट गया है जब ‘सक्सेसफुल स्टार्टअप’ का मतलब सिर्फ बेंगलुरु, मुंबई या दिल्ली-NCR की चकाचौंध हुआ करता था. आज देश के टियर-2 और टियर-3 शहरों के युवा अपनी मिट्टी से जुड़कर 8 हजार करोड़ (1 अरब डॉलर) से ज्यादा की वैल्यूएशन वाली ‘यूनिकॉर्न’ कंपनियां खड़ी कर रहे हैंमहानगरों का एकाधिकार खत्म
पिछले कुछ वर्षों में, देसी स्टार्टअप्स ने यह साबित कर दिया है कि आईटी हब या मेट्रो सिटी का होना सफलता की जरूरी शर्त नहीं है. जयपुर, पुणे, इंदौर, कोयंबटूर और यहां तक कि सिलवासा जैसे छोटे स्थानों से ऐसे बिजनेस निकल रहे हैं जो ग्लोबल लेवल पर अपनी धाक जमा रहे हैं. इन शहरों में कम ऑपरेशनल कॉस्ट, टैलेंट की प्रचुरता और स्थानीय समस्याओं के समाधान की भूख ने इन्हें स्टार्टअप का नया पावरहाउस बना दिया है.सफलता की शानदार कहानियां
छोटे शहरों से निकलकर आसमान छूने वाले कुछ प्रमुख नाम इस प्रकार हैं-
- जोहो (Zoho): श्रीधर वेम्बू ने तमिलनाडु के एक छोटे से गांव ‘तेनकासी’ से काम करके दुनिया को दिखा दिया कि वर्ल्ड क्लास सॉफ्टवेयर बनाने के लिए सिलिकॉन वैली जाने की जरूरत नहीं है. जोहो टिपिकल यूनिकॉर्न नहीं मानी जाती है, लेकिन इसकी वैल्यूएशन 1 अरब डॉलर से कहीं ज्यादा मानी जाती है.
- फिजिक्स वाला (PhysicsWallah): प्रयागराज की गलियों से शुरू हुआ अलख पांडे का यह सफर आज एक एडटेक दिग्गज बन चुका है, जो करोड़ों छात्रों को किफायती शिक्षा दे रहा है.
- कारदेखो (CarDekho): जयपुर जैसे शहर से निकलकर इस कंपनी ने ऑटोमोबाइल सेक्टर में अपनी पहचान बनाई और आज हजारों करोड़ का साम्राज्य खड़ा किया है.लोकल युवाओं के लिए नई प्रेरणा
इन स्टार्टअप्स की सफलता ने छोटे कस्बों के युवाओं की सोच बदल दी है. अब युवा नौकरी की तलाश में पलायन करने के बजाय अपने ही शहर में रोजगार पैदा करने का सपना देख रहे हैं. सरकार की ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसी योजनाओं और बेहतर इंटरनेट कनेक्टिविटी (5G) ने छोटे शहरों के युवाओं को पंख दिए हैं. भारत का अगला बड़ा आईडिया किसी महानगर की हाई-राइज बिल्डिंग से नहीं, बल्कि शायद आपके पड़ोस के किसी छोटे से कस्बे से निकलने वाला है.





