आज से दस दिन पहले जब ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत की ख़बर हामिद ने सुनी, तो वह बेहद ख़ुश हुए. वह जश्न मनाने के लिए अपनी पत्नी और बेटी को तेहरान स्थित अपने घर के बाहर सड़क पर ले गए.
अगले कुछ दिनों तक, जब अमेरिका और इसराइल के बम राजधानी के अलग-अलग हिस्सों में इमारतों पर गिर रहे थे, तब यह परिवार घर की छत पर जाकर हवाई हमलों को देखता रहा.
हर बार जब सत्ता से जुड़े किसी ठिकाने पर हमला होता, तो वे खुशी ज़ाहिर करते.
हामिद ने ब्रिटेन में रह रहीं उनकी एक कज़न के ज़रिए मुझसे कहा, “ज़रा सोचिए, इस धरती पर कहीं और ऐसा मिलेगा, जहाँ लोग अपने ही देश पर बाहरी हमले से खुश हों.”
“अब हमें उम्मीद है कि जल्द ही इस सरकार का पतन होगा. हम खुश हैं.”
हामिद (बदला हुआ नाम) ऐसे अकेले शख़्स नहीं हैं, जो ऐसा सोचते हैं.
हमने ईरान के अंदर और बाहर रहने वाले लोगों से बात की.
बीता हफ़्ता उनके लिए, उनके देश के भविष्य के लिए और पूरे क्षेत्र के लिए बेहद अहम रहा है.
सेवा है, जो फ़ारसी भाषा में संचालित होती है. बीबीसी फ़ारसी का इस्तेमाल दुनियाभर के 2 करोड़ 40 लाख लोग करते हैं.
को ब्लॉक किए जाने और इसके प्रसारण में बाधा डालने के बावजूद इसे इस्तेमाल करने वालों में ज़्यादातर ईरान में रहने वाले लोग हैं.
ईरान पर लगातार बमबारी हो रही है और इंटरनेट पर कड़ी पाबंदियाँ लगी हुई हैं. ऐसे में नौ करोड़ की आबादी वाले इस विशाल देश में लोगों के मन में क्या चल रहा है ये समझ पाना आसान नहीं है.
तेहरान के लोगों को ऐसे संदेश मिले हैं, जिनमें चेतावनी दी गई है.
इन संदेशों में कहा गया है, “अगर आने वाले दिनों में आपका इंटरनेट कनेक्शन जारी रहता है, तो आपकी लाइन ब्लॉक कर दी जाएगी और आपको अदालत में पेश किया जाएगा.”
शासन अब भी लोगों में डर पैदा करने की कोशिश कर रहा है और जो भी सरकार के ख़िलाफ़ बात करता है वो अपना नाम ज़ाहिर करने को तैयार नहीं है.
कुछ लोग अब भी हर हमले का जश्न मना रहे हैं, वहीं कुछ लोगों का डर बढ़ता जा रहा है. ये लोग इस युद्ध के मक़सद और इसके अंत को लेकर सवाल उठा रहे हैं.
अली ने हमसे कहा, “इस युद्ध का मक़सद ईरानी लोगों के लिए आज़ादी या लोकतंत्र लाना नहीं है.”
“यह इसराइल, अमेरिका और क्षेत्र के अरब देशों के भू-राजनीतिक फ़ायदे के लिए है.”
तेहरान में रहने वाले मोहम्मद ने कहा कि वह अमेरिका और ईरान के बीच कोई समझौता चाहते थे ताकि युद्ध को टाला जा सके.
उन्होंने कहा, “दिल से मैं हमेशा यही उम्मीद करता रहा कि कोई समझौता हो जाए.”
मोहम्मद को लगा था कि ख़ामेनेई की मौत पर उन्हें खुशी होगी, लेकिन आख़िर में “उन्हें कुछ भी महसूस नहीं हुआ.”
उन्होंने मेरे सहयोगी सोरौश पकज़ाद से कहा कि वह भविष्य को लेकर अनिश्चितता से भरे हुए हैं. हर जगह सरकार की चौकियाँ हैं और आसमान से बम गिर रहे हैं, इसलिए उन्हें डर लग रहा है.
वहीं कुछ अन्य ईरानियों ने कहा कि वे डर, तनाव और उम्मीद – तीनों महसूस कर रहे हैं.
एक महिला ने मुझसे कहा कि अगर मुझे यह समझना है कि वह और दूसरे ईरानी इस समय क्या महसूस कर रहे हैं, तो मुझे 40 साल ईरान में रहना होगा.
उन्होंने कहा, “जब सत्ता पर हमला होता है तो हम हँसते हैं और खुश होते हैं, लेकिन जब बच्चे मारे जाते हैं और हमारा इन्फ़्रास्ट्रक्चर तबाह होता है, तो हमें अपने देश के भविष्य की चिंता होने लगती है.”
ईरान में कोई ओपिनियन पोल नहीं होते. लेकिन ज़्यादातर ईरानी अपनी मौजूदा सरकार से नफ़रत करते दिखाई देते हैं.
हालाँकि, देश में अब भी सरकार के बड़ी संख्या में कट्टर समर्थक हैं, लेकिन उसके विरोधियों में भी मतभेद हैं. कुछ लोग अमेरिका और इसराइल के हमलों का समर्थन कर रहे हैं, जबकि कुछ लोग उन पर गहरा शक जताते हैं.
सईद ने हमसे कहा, “ट्रंप की सरकार में ऊपर से नीचे तक सब झूठ बोल रहे हैं. ईरान पर हमला करने की उनके पास कोई वजह नहीं थी. सिवाय इसके कि इसराइल ऐसा चाहता था.”
ख़ुद ईरानी शासन के बयानों के अलावा, उसके समर्थकों की आवाज़ें हमें बहुत कम सुनाई दे रही हैं.
हम उन लोगों से भी नहीं सुन पाए हैं जिन्होंने सबसे ज़्यादा नुक़सान झेला है, जैसे- दक्षिणी शहर मीनाब के एक प्राथमिक स्कूल पर 28 फ़रवरी को हुए हमले में मारे गए बच्चों के माता-पिता.
यह अब तक युद्ध का सबसे बड़ा जानलेवा हमला माना जा रहा है.
लेकिन कई ईरानियों ने बीबीसी से कहा कि इस्लामी गणराज्य के 47 साल बाद वे इससे इतनी निराशा महसूस कर रहे हैं कि मौजूदा युद्ध ही उन्हें आज़ादी की आख़िरी उम्मीद लगता है.





