पलामूः आम की बागवानी में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के लगातार उपयोग से मिट्टी की सेहत पर नकारात्मक असर पड़ता है. शुरुआत में रासायनिक दवाएं असरदार दिखती हैं, लेकिन समय के साथ उनकी प्रभावशीलता कम हो जाती है और कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है. इसके विपरीत जैविक उपाय मिट्टी की उर्वरता को लंबे समय तक बनाए रखते हैं.
सड़ा हुआ गोबर खेत की मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाता है और सूक्ष्मजीवों की सक्रियता को प्रोत्साहित करता है. लकड़ी की राख में पोटाश और अन्य खनिज तत्व होते हैं, जो मंजर और फल बनने में सहायक होते हैं. नीम की पत्तियों का उपयोग प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में किया जाता है, जिससे हानिकारक कीटों पर नियंत्रण रहता है और पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है.
गोबर और राख से पोषण प्रबंधन
पलामू के किसान तारकेश्वर सिंग के अनुसार 10 वर्ष पुराने आम के पेड़ में 50 से 60 किलो सड़ा हुआ गोबर डालना लाभकारी होता है. इससे मिट्टी में जैविक तत्व बढ़ते हैं और जड़ों का विकास बेहतर होता है. लकड़ी की राख में पोटाश प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो मंजर आने और फल बनने में सहायक है. नियमित रूप से इनका प्रयोग करने से पेड़ मजबूत बनते हैं और फल की गुणवत्ता सुधरती है. जो किसान अभी आम में कर सकते है.
नीम से प्राकृतिक कीट नियंत्रण
उन्होंने कहा कि आम के पेड़ों में मंजर आने के समय कीटों का प्रकोप बढ़ जाता है. ऐसे में रासायनिक दवाओं की जगह नीम की पत्तियों का उपयोग प्रभावी विकल्प है. किसान नीम की पत्तियों को सुखाकर जड़ों में डालते हैं. जरूरत पड़ने पर पत्तियों को गर्म पानी में उबालकर उसका छिड़काव किया जाता है. नीम में प्राकृतिक कीटनाशक तत्व होते हैं, जो हानिकारक कीटों को नियंत्रित करते हैं और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं.
प्रगतिशील किसान का सफल प्रयोग
झारखंड के प्रगतिशील किसान तारकेश्वर सिंह चेरो इन जैविक उपायों को अपने बाग में सफलतापूर्वक अपना रहे हैं. उनके खेत में 355 आम के पेड़ हैं और सभी पेड़ों में इस समय शत प्रतिशत मंजर आ चुका है. वे प्रत्येक पेड़ में 50 से 60 किलो सड़ा गोबर और राख का उपयोग करते हैं. कीट नियंत्रण के लिए नीम आधारित उपाय अपनाकर उन्होंने रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम कर दी है. जिससे वो सालाना लगभग 10 लाख रूपये कमाते है.
आम की उन्नत प्रजातियां और लाभ
तारकेश्वर सिंह ने अपने बाग में 8 प्रजातियों के आम लगाए हैं. इनमें दूधिया लंगड़ा प्रमुख है. इसके साथ आम्रपाली, दशहरी और मल्लिका जैसी उन्नत किस्में भी शामिल हैं. अलग अलग प्रजातियों से बाजार में विविधता मिलती है और बेहतर दाम प्राप्त होते हैं. जैविक पद्धति और उन्नत किस्मों का समन्वय आम की बागवानी को लाभकारी और टिकाऊ बना सकता है.





