वैशाली: बिहार के वैशाली जिले का चांदी गांव आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है, और इसका श्रेय जाता है वहां स्थित एक छोटी-सी, लेकिन ऐतिहासिक पेड़े की दुकान को. पिछले 7 दशकों से एक पुरानी झोपड़ी से संचालित हो रही यह दुकान न केवल अपनी बेमिसाल मिठास के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह तीन पीढ़ियों के संघर्ष और परंपरा की जीवंत मिसाल भी बन चुकी है. आज के आधुनिक दौर में जहां मिठाइयों में मिलावट और मशीनीकरण बढ़ गया है, वहीं चांदी गांव की यह दुकान अपने पारंपरिक स्वाद और शुद्धता के कारण इलाके की शान बनी हुई है.इस दुकान की नींव करीब सात दशक पहले स्वर्गीय सुरेश शाह ने रखी थी. उस समय सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने शुद्ध दूध और मेहनत को अपना हथियार बनाया. उनके हाथ के बने पेड़े इतने लोकप्रिय हुए कि जल्द ही ‘चांदी गांव का पेड़ा’ एक ब्रांड बन गया. सुरेश शाह के बाद उनके पुत्र और अब तीसरी पीढ़ी के रूप में धीरज कुमार इस विरासत को बखूबी संभाल रहे हैं. समय बदला, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन पेड़े बनाने की विधि और उसकी गुणवत्ता में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया.पारंपरिक तरीके से तैयार होता पेड़ा
दुकान की सबसे बड़ी विशेषता इसका निर्माण कौशल है. यहां आज भी आधुनिक मशीनों के बजाय पारंपरिक तरीके से हाथों से पेड़े तैयार किए जाते हैं. शुद्ध दूध को घंटों तक कड़ाही में जलाकर मावा तैयार किया जाता है और फिर उसमें संतुलित मिठास मिलाकर पेड़े का आकार दिया जाता है. संचालक धीरज कुमार का कहना है कि वे आज भी उसी ईमानदारी और शुद्धता का पालन करते हैं जो उनके दादा जी ने शुरू की थी. यही कारण है कि हाजीपुर, लालगंज और दूर-दराज के इलाकों से लोग विशेष रूप से यहां खिंचे चले आते हैं.ग्राहकों का अटूट विश्वास ही इस दुकान की असली पूंजी हैं स्थानीय ग्राहक महेंद्र कुमार और संजय कुमार बताते हैं कि इस पेड़े की बराबरी कोई और नहीं कर सकता. उनके घरों में हर खुशी के मौके पर और रिश्तेदारों को सौगात के रूप में भेजने के लिए यही पेड़े पहली पसंद होते हैं. त्योहारों और शादियों के सीजन में यहां पैर रखने की जगह नहीं होती. 70 साल से मिठास बांट रही यह छोटी सी दुकान आज इस बात का प्रमाण है कि यदि गुणवत्ता और स्वाद से समझौता न किया जाए, तो समय की हर कसौटी पर सफलता हासिल की जा सकती है.
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